बुधवार, 7 जनवरी 2015

गांव क्या है....

       गांव कहते ही मन में एक खुशनुमा एहसास जाग उठता है। खेत, खलियान, पालतु जानवर, किसान आदि अनेक चित्र कल्पना में आ जाते है। लेकिन क्या यह एहसास आज के युवामन में भी आते होंगे, यह चिंतन का विषय है ? गांव की कल्पना वही व्यक्ति कर सकता है जो कभी ऐसे माहौल में रहा हो, जिसका परिवार, नाते रिश्तेदारों ने इस  परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश की हो। पर आज कितने लेाग ऐसे है जो गांव जाना चाहते है, जाना तो चाहते है पर केवल घुमने के लिए। पर वहां बसने के लिए कोई नहीं जाना चाहता।
    आज की पड़ताल है गांव क्या है? इसकी खोज करना क्‍योंिक आज गांव हमारे मनों से कही खो से गए है। गांव, एक शब्द में कहूं तो सहयोग का दूसरा नाम  है। यकीन नहीं होता तो गांवों की पद्धतियों को स्मरण करके देखो। यहां सहयोग से तात्पर्य उस पवित्र परंपरा से है जिसके अतंर्गत गांव हर समय एक नेटवर्क की तरह जुड़ा रहता है। इतने बड़े समूह के तौर पर कुशल संचार प्रक्रिया का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता है। वृक्ष की जड़ की तरह गांव किसी भी समाज का मूल होता है। बिना पैर के शरीर जिस प्रकार असहाय हो जाता है, उसी प्रकार गांव से जुड़े बिना मनुष्य संस्कृति, संस्कारों से दूर हो जाती है।
गांव एक परंपरा का नाम है। यह संस्कारों की पाठशाला है। देश का प्रत्येक नागरिक गांव से अपनी शुरूआत करता है या कहे वह किसी न किसी रूप से गांव से जुड़ा होता है। गांव हर व्यक्ति के अंदर बीज बोने का काम करता है ताकि भविष्य में उसका फल समाज के काम आ सके। गंाव एक आनंद है जिसमें संतोष का सुख है। गांव अर्थव्यवस्था से राजव्यवस्था की धूरी है। लेकिन आखिर में इन सब विशेषताओं के सोचने के बाद हमें गांव की परिभाषाओं के बारे में क्यों सोचना पड़ रहा है। शायद इसलिए क्योंकि गांव आज हमसे दूर चले गए है या कहे गावों से हम दूर चले गए है। पर कितने दिनों तक हम अपनी जड़ों से दूर रह सकते है। कभी न कभी तो हमें उस ओर लोटना ही होगा।

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