गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

उत्‍तराखंड के विकास के लिए सुझाव- आदर्श कुटीर योजना

पहाड़ के विकास का मॉडल उसकी मूल प्रकृति से जुड़ा होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए काम किए जाएं। लोगों को संस्कृति और उनके संसाधानों से जोड़ने के प्रयास किए जाएं। यहां विकास से अभिप्राय जीवन शैली में गुणात्‍मक सुधार के सा‍थ रोजगार की उपलब्धता कराना हैं। जिसमें जैविक उत्पादपर्यटनवानिकीजड़ी-बूटी उत्पादनगौ उत्पादसौर-ऊर्जालघु एवं कुटीर उघोगोंयोग एवं वैकल्पिक चिकित्सा उपक्रम आदि क्षेत्रों में काम करके रोजगार मुहैया कराया जा सकता है। इस क्षेत्रों में काम करके स्थानीय लोगों को रोजगार तो मिलेगा और साथ ही पहाड़ की संस्कृति और पर्यावरण का भी उन्नयन होगा।
इस माडॅल की विशेषताएं हैं।
1. सामुदायिकता
2. प्रकृति से जुड़ा हुआ
3. संस्कृति एवं संस्कार युक्त
4. स्वच्छता का विशेष ध्यान
5. नशा मुक्त
6. स्वावलंबी
7. आध्यात्मिक वातावरण


आदर्श कुटीर योजना-

 परिवार, समाज की सबसे छोटी इकाई होती है। समाज के विकास का रास्ता परिवार से होते हुए जाता है। परिवार निर्माण के बाद ही समाज निर्माण की सोची जा सकती है। गांव को आदर्श बनाने से पहले कुछ घरों को माडॅल के तौर पर विकसित करने की जरूरत है। अतः इस योजना के तहत प्रारम्भिक तौर पर एक जिले के कुछ घरों को चिन्हित करके प्रारम्‍भ की जा सकती है। बाद में इसे शेष उत्तराखंड में भी लागू किया जा सकता है।

क्‍या हो आदर्श कुटीर में सुविधांए

1. देशी गाय- कम से कम दो देशी गाय होनी चाहिए। जिनके दूध के साथ-साथ गौमूत्र का भी प्रयोग किया जा सकता है। इससे पंचगव्य घ्रत, गौमूत्र अर्क आदि बनाया जा सकता है।

2. गोबर गैसं प्लांट- यह लगभग तीन घनमीटर का प्लांट होगा जिसके माध्यम से प्रतिदिन सात किलों गैंस का उत्पाद होगा जिससे भोजन के अतिरिक्त अन्य जरूरतों के लिए ईधन को प्रयोग किया जा सकता है।

3. जैविक कृषि एवं वानिकी - पहाड़ी राज्य में खेतों का आकार छोटा होता है लेकिन मिट्टी की प्रकृति जैविक उत्पादों के लिए उपयुक्त है। आज जैविक फल, सब्जियों के लिए बाजार में बहुत मांग है। प्रारम्भ में इसके लिए कम से कम 1 एकड़ जमीन की आवश्यकता होगी। जैविक के लिए आवश्यक अवयव निम्न हैं।
जीरो बजट फार्मिग- जैविक कीटनाशक एवं जैविक खाद निर्माण एवं इस्तेमाल।
वर्मी कम्पोस्ट
चकबंदी- परिसर की तार-बाड़।
सिंचाई की व्यवस्था

4. सौर ऊर्जा प्लांट- पहाड़ों में सुर्यताप हमेशा बना रहता है इसलिए सौर ऊर्जा वैकल्पिक सौर ऊर्जा का साधन हो सकता है। जिसे व्यक्तिगत प्रयोग के साथ व्यवसायिक उपयोग भी किया जा सकता है।

5. वर्षा जल संचयन- पानी के संचयन के साथ साथ तेज बहाब हो भी रोकेगा। संचयित जल से सिंचाई इत्यादि का किया जा सकता है।

6. यज्ञोपैथी एवं संगीत चिकित्सा- वैज्ञानिक शोधों के निष्कर्ष के पता चला है कि यज्ञ चिकित्सा एवं संगीत चिकित्सा के माध्यम से कृषि में उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है।

7. सुलभ शौचालय- स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक परिवार में शौचालय का उचित प्रबंध होना चाहिए।

8. कम्प्यूटर एवं इन्टरनेट की व्यवस्था- आज के सूचना प्रौद्योगिकी के युग में कम्प्यूटर और इंटरनेट सामान्य व्यक्ति को वैश्विक समाज से जोड़ने के लिए आवश्यक है। सोशल मीडिया के उपयोग आपके छोटे से व्यवसाय को बढ़ा सकता हैं।

9. लघु एवं कुटीर उघोग- हवन सामाग्री, अगरबत्ती, देशी मसाले जैसे प्रयासों से स्वाबलम्बन को बढ़ावा दिया जा सकता है।

10. होम स्टे पर्यटन- अपने घर में एक कमरा पहाड़ी संस्कृति के आधार पर तैयार करना जिसके पर्यटक संस्कृति के प्रसार के साथ, आजीविका में भी वृद्धि होगी।

 ये सभी प्रकार की सुविधाओं केे लिए अनेक सरकारी योजनाएं है, आवश्‍यकता है कि इन्‍हे समायोजित एवं समग्र तौर क्रियान्‍वयन किया जाए। जिसमें इन सभी योजनाओं का एक पैकेज बनाया जा सकता है।


रविवार, 17 फ़रवरी 2019

पहाड़ की विरासत - नौला-धारा

हिमालयी क्षेत्र सदियों से पानी, पहाड़ों, नदियों, जलवायु, जैवविविधता एवं वृहत्त सांस्कृतिक विविधता का मूल रहा है। लेकिन गंगा-यमुना नदियों का उद्गम स्थल उत्तराखण्ड, जो समस्त उत्तर भारत को सिंचता है, आज खुद प्यासा है। यहाँ पानी का मुख्य माध्यम प्राकृतिक जल स्रोत है। जो वनाच्छादन की कमी, वर्षा का अनियमित वितरण एवं अनियंत्रित विकास प्रक्रिया के कारण सूखते जा रहे हैं। ऐसे में जब जलागम की पाइप लाइनें, स्वजल द्वारा लगाए गए हैण्डपम्प से पानी मिलना बन्द हो जाता है, तब लोगों का ध्यान प्राकृतिक स्रोतों की ओर जाता है। जो आज मरणासन्न की स्थिति में हैं।

उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मण्डल के नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर जिलों में चिराग संस्था के माध्यम से एवं अर्घ्यम, एक्वाडेम, पीएसआई सस्थाओं के सहयोग से प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का काम किया जा रहा है। इस काम में स्थानीय लोगों की भागीदारी को बढ़ाने के साथ महिला नेतृत्व आधारित जल समितियों का निर्माण किया गया है। जिसके माध्यम से नौले के जलग्रहण क्षेत्र में खाल, चेकडैम, कन्टूर ट्रेंच, एवं वृक्षारोपण का काम किया जा रहा है। इसके साथ ही जल की गुणवत्ता की जाँच एवं भूजल प्रबन्धन, एवं स्रोत सम्बन्धित जागरुकता बढ़ाने का काम किया जा रहा है। संस्था द्वारा पिछले कुछ सालों मेें लगभग 53 जल समितियों के माध्यम से 90 से अधिक जल स्रोतों पर काम किया गया। जिनमें जनसहयोग एवं जनभागीदारी के माध्यम से नौलों, पनेरों और धारों पर गाँवोें में जल संवाद स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। जंगलों में वृक्षारोपण, वनाग्नि, पर्यावरण संरक्षण आदि के कार्यों को समिति के माध्यम से किया जा रहा है।

प्रस्तुत डाक्यूमेंट्री में प्राकृतिक जल स्रोत की उपयोगिता के साथ उनकी वर्तमान दशा एवं उस क्षेत्र में किये गए सामुदायिक प्रयासों को दिखाने का प्रयास किया गया है।

https://www.youtube.com/watch?time_continue=19&v=yVXNEFRy_Uo 


विशेष आभार- श्री केसर सिंह, चिराग संस्था
निर्माता- इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)
निर्देशक - डाॅ. मुकेश बोरा
शोध एवं कैमरा- वैशाली मांगलिया, मृदुल पांडगरे
सम्पादन- विवेक पांडे

अपनी बदहाली पर रोता उत्‍तराखंड

अमरीकी विद्वान लेखक डेविड फ्रॅाले के अनुसार पृथ्वी की सबसे पहली ईसा से कम से कम 7000 साल पहले की सभ्यता वैदिक सभ्यता है और यह हिमालय क्षेत्रीय सभ्यता है। जिसमें भारत के 11 राज्य आते हैं, उत्तराखंड जिनमें एक राज्य है।
राज्य आंदोलनकारी त्रेपन सिंह चौहान ने अपनी पुस्तक यमुना में उत्तराखंड राज्य बनने से पूर्व की कहानी को बताते हुए लिखते हैं ‘‘तमाम दुःख उठाकर हम अपने बच्चों को पालते पोसते हैं और वे जब बड़े होते हैं तो हमें छोड़कर नौकरी की तलाश में मैदानों की ओर चले जाते हैं। .........इन पहाड़ों में बहने वाली नदियों का पानी और पहाड़ में पलने वाली जवानी, ये दोनों हमारे किसी काम नहीं आतीं। पहाड़ों का पानी पहाड़ों के कभी काम आया भी, तब, जब पहाड़ों के असहनीय कष्टों से जीने से बेजार होने पर यहां की महिलाओं को निराश होना पड़ा, तो उन्होंने इन नदियों में डूबकर आत्महत्या कर ली।
  ये दुःख तब निकला, जब लम्बे समय से यह पहाड़ी क्षेत्र पिछड़ेपन का शिकार हो रहा था। 1993.94 से 1999.2000 के बीच उत्तराखंड क्षेत्र उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, तब इसकी विकास दर 2.9 फीसदी थी जबकि वार्षिक राष्ट्रीय विकास दर 6.6 फीसदी थी। उसी समय पड़ोसी पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की विकास दर 7 फीसदी थी। यह विरोधाभास भी एक अलग पड़ोसी राज्य के लिए आंदोलन का प्रमुख कारण था। संघर्षों और आंदोलनो के बाद, 9 नवंबर 2000 को अपार उम्मीदों और आकाक्षाओं के साथ उत्तर प्रदेश से अलग होकर देश का 27 वां राज्य उत्तराखंड बना। लेकिन स्थिति में कोई खासा बदलाव नहीं आया। राज्य फिर पहाड़ और मैदान में बंट गया। त्रेपन सिंह चौहान अपनी पुस्तक हे ब्वारी में राज्य निर्माण के बाद की कहानी को यमुना की दांसता के रूप में बताते हुए लिखते हैं...कैते है कि यां भौत बिकास हो रा है। देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी में फैकटरी लग री है। हमें लगा चलो राज बनाने में हमारा चाहे कुछ फैदा नी हो रहा। इस प्रदेश में किसी का तो फैदा हो रा है। जिस राज के लिए हमने इतना कुछ बर्बाद किया उसका फायदा हमारे भाई बंधुओं को तो मिलना चाए। इन फैकटरियों से हमको फैदा मिलना तो दूर वो हमारे छोरों का खून चूसने वाली जोक बनकर आए है इस राज में। अपना हाड़-मांस गलाकर हम इन बच्चों को जवानी दे रहे हैं और वे इस जवानी को चूसकर बर्बाद कर रे हैं। ये कथन उस विभाजन को ओर इशारा कर रहा है जो राज्य निर्माण के बाद इन 17 सालों में पैदा हुआ। यहां कुल 13 जिले है, जिसमें 4 मैदानी और 9 पहाड़ी है। कुल क्षेत्रफल का 90 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी है। लगभग 30 लाख से ज्यादा शहरी आबादी है और 70 लाख से ज्यादा ग्रामीण है। यहां कुल आबादी में 30.55 शहर है और 69.45 प्रतिशत गांव है। यह विभाजन पहाड़ के 9 जिलों के साथ मैदान के 4 जिलों के बीच का है, राज्य बनने के बाद प्रति व्यक्ति आय में दस गुना का इजाफा हुआ। राज्य में पर्यटन का विकास हुआ। राज्य ने वृद्धि तो की साथ में असमानता और विस्थापन में भी तेजी आयी।
विस्थापन-
2000 से 2011 के बीच के आंकडों के आधार पर जनसंख्या में वृद्धि असमानता दिखती है। एक ओर जहां चार मैदानी जिलों नैनीताल-25.2, देहरादून-32.48, उधमसिंह नगर-33.4 और हरिद्वार-33.16 प्रतिशत जनंसंख्या की बढ़ोतरी हुई है। वही इन दस सालों में अल्मोड़ा-1.73 और पौढ़ी गढ़वाल -1.51 प्रतिशत जनसंख्या में गिरावट देखी गई। जो लगातार हो रहे विस्थापन की ओर इंगित करता है। विस्तापन के प्रमुख कारणों में बेरोजगारी और शिक्षा के उचित संशाधनों का अभाव है। यहां चार प्रकार के विस्थापन देखने को मिलते है, जिनमें रोजगार के लिए पुरूष का और शादी के कारण महिलाएं का राज्य से बाहर जाती है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग अपने गावों को छोड़कर आसपास के शहरों में आकर रहने लगते है जिसे अंर्तराज्यीय विस्थापन कहा जाता है। साथ ही कुछ लोग एक जिले से दूसरे जिले में कतिपय कारणों से विस्थापित हो जाते है और इनमें से कुछ देश के बाहर शिक्षा दिक्षा के लिए विस्थापन करते है। विस्तापन राज्य की लगातार खतरनाक हो रही समस्या है।
जनसंख्या की असमानता-
राज्य में जनसंख्या की असमान वितरण देखने को मिलता है। एक ओर जहां उत्तरकाशी जिले में कुल राज्य की कुल जनंसंख्या का 3.26 प्रतिशत आबादी निवास करती है और जिले का जनसंख्या धनत्व 41 वर्ग किमी है। वहीं दूसरी ओर राज्य के एक अन्य जिले हरिद्वार की जनंसंख्या 19.05 प्रतिशत है और वहां का जनंसंख्या धनत्व 817 है। ध्यात्वय हो कि उत्तराख्ांड का जनसंख्या धनत्व औसत 189 और देश का औसत धनत्व 382 है। इस प्रकार  एक आकड़े के अनुसार 9 पहाड़ी जिलों की जनसंख्या 38.43 प्रतिशत है और 4 मैदानी जिलों की आबादी का प्रतिशत 61.57 है। इस असमान जनसंख्या वितरण को असमान संशाधनों के वितरण के रूप में भी देखा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत आवश्यकताओं की कमी रहती है वही मैदानी जिलों में रोजगार के साधनों के साथ रोड़, स्कूल, चिकित्सालयों की उचित व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त गावों से लगातार लोगों का पलायन हो रहा है। 2001 में 16,826 गांव थे जो 2011 में 16,793 गांव हो गए  है और भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
असमान आर्थिक वितरण-
वर्ल्ड बैंक ने डीआईपीपी के साथ मिलकर निकाली व्यापार सुगमता रिर्पोट के आधार पर उत्तराखंड राज्य अपने पिछले स्थान 23 से 9 वे नंबर पर आ गया है। एसोचौम के आर्थिक अनुसंधान ब्यूरो की रिर्पोट में उत्तराखंड एक दशक में उद्योग और सेवा क्षेत्रों में सबसे आगे रहा है। ताजा अध्ययन के अनुसार 2004-05 से 2014-15 में उद्योग क्षेत्र में 16.5 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र में 12.3 प्रतिशत सालान वृद्धि हासिल की है। जो साल प्रतिशत की औसत सालाना वृद्धि के मुकाबले कही आगे है। उत्तराखंड सीएजीआर में शीर्ष पर है। इस अवधि के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में उत्तराखंड का योगदान 0.8 प्रतिशत से बढ़कर 1.2 तक पहुच गया है। इन सब के बावजूद पिछले दस सालों में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। यह 22 प्रतिशत से लुढ़कर 9 प्रतिशत पर पहुंच गया है। राज्य की 75 प्रतिशत से ज्यादा आबादी आज भी कृषि पर निर्भर करती है। उत्तराखंड औषधीय पौधों के मामले में बहुत महत्वपूर्ण है यहां 175 प्रकार की विरल औषधी मिलती है। इसके अतिरिक्त फल, सब्जी और औषधी उत्पादन की दृष्टि से राज्य की भूमि उर्वर है। इन सब के बावजूद यह वानिकी के क्षेत्र में हिमालच और अन्य राज्यों की तुलना में काफी पीछे है।
मैदानी जिले हरिद्वार, नैनीताल, उधमसिंह नगर और देहरादून जिलों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान है। उघोग निदेशक उत्तराखंड के आंकड़े के अनुसार दिसंबर 2012 में 230 उघोग थे जिनमें 274,501.81 करोड़ का निवेश किया गया और जो 85,333 लोगों को रोजगार देती थी। इन उघोगों का उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र तक सिमित होने की वजह से 90 प्रतिशत पहाड़ी भाग पिछड़ता जा रहा है। एक ओर जहां आकड़ों के आधार पर राज्य अव्वल बना है वही दूसरी ओर इन पर गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि यह मात्र चार जिलों के तक सिमित है। राज्य में पर्यटन एक बड़ा आर्थिक माध्यम है। पर्यटन 2013-14 में 20.03 लाख से 2014-15 में 22.09 लाख हो गया है। चार धाम  और पहाड़ी क्षेत्रों में धूमने के लिए हर साल सैलानी उत्तराखंड आते है। यह धार्मिक पर्यटन के साथ स्वास्थ्य, साहसिक पर्यटन का मुख्य क्षेत्र रहा है। लेकिन दूर्भाग्य है कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से पर्यटन के लिए सुनियोजित माडॅल नहीं बन पाया है।
उत्तराखंड के बदहाल हालत के कारणों की बात करें तो सबसे पहले राजनैतिक अस्थिरता है। 17 सालों में राज्य त्रिवेन्द्र सिंह रावत 17वे मुख्यमंत्री हैं। जिसमें नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए है। इसके आलावा एक बहुत बड़ा कारण के उत्तर प्रदेश के माडॅल पर पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के विकास करने की बात की जा रही है। भले ही उत्तर प्रदेश से अलग हुए 17 साल हो गए है परंतु आज भी देहरादून में बैठी सरकार वही काम कर रही है जो लखनउ में बैठकर करती थी। 1979 में उत्तर प्रदेश के तत्कालिन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव ने कहा था कि क्या प्रदेश में पहाड़ भी है? इन चितांओं को ध्यान में रखकर ही 2000 में अलग उत्तराखंड राज्य की स्थापना की गई। लेकिन हालत आज भी जस की तस है। 90 प्रतिशत पहाड़ी राज्य की राजधानी देहरादून होना एक और बड़ा बाधक है विकास में। सन् 1984 में जब सबसे पहले अलग उत्तराखंड राज्य की मांग उठी थी तभी से चमोली जिले में स्थित गैरसैण को राजधानी बना दिया गया था। लेकिन आज भी यह मामला राजनितिक घोषणा पत्रों में लटका पड़ा है।
आज पहाड़ी जिलों में लोंगों में निराशा है भय है। निराशा सरकार से और भय प्राकृतिक आपदाओं का । इस वजह से वे अपने घरों को छोड़कर कही भी जाने को मजबूर है। इसके चलते राज्य में भूताहा गावों की संख्या बढ़ती जा रही है। खेत बंजर हो रहे है घर खाली हो रहे है। राजनेताओं के बीच एक और वर्ग है जो ठेकेदार है। चाहे वो भूमाफिया हो, खनन हो, स्कूल, रोड़ के निर्माण की धांधली हो इनके पीछे ये ही गिरोह है। जो राज्य में दीमक की तरह काम कर रहा है। प्राकृतिक संशाधनों से भरापूरा राज्य उत्तराखंड बेहाल हो रहा है तो उसमें राजनेताओं के साथ ठेकेदारों का भी बहुत बड़ा हाथ है।
आज राज्य में सामाजिक एवं सांस्कृतिक बनावट के साथ विकास करने की जरूरत है। साथ ही राज्य की पर्यावरणीय चिंता के साथ विकास के माडॅलों का नियोजन करना चाहिए। फल, सब्जी उत्पादन के साथ सरकार को पर्यटन एवं कुटीर उघोगों को बढ़ावा देकर राज्य में बेरोजगारी की चिंता से लड़ा जा सकता है। इस सब के साथ राज्य में दबाव समूहों, गैर सरकारी संगठनों को भी सामाजिक एवं राजनैतिक चेतना जगाने का काम करना चाहिए।

यहाँ किसान ही नहीं बचे तो क्या होगा?


मेरे गाँव के लोग इस बार गेहूं नहीं लगाने वाले हैं। सही भी हैं, क्योंकि इससे पहले वे लोग घान की फसल, बारिश के नहीं  औऱ सही समय पर नहीं होने की वजह से ख़राब कर चुके हैं। यही कारण था कि इस साल असोज में खेतों का दृश्य डरावना था। चारों ओर बस घास ही घास। जिन खेतों में मैंने कुछ साल पहले घान, गेहूं, मडुवा आदि फसलों को लगा देखा, वहाँ आज बस घास का जंगल हैं। यहाँ लोग असोज में सुबह-सुबह निकल पड़ते ओर देर शाम तक घास ही काटते रहते। खुशी-खूशी वे लोग घास काट रहे हैं। लुटे लगा रहे हैं। दिन-रात एक कर रहे हैं। अपने खेतों में घास के जंगल को देखकर वे कितने खुश हैं/या कितने कम दुःखी हैं। सवाल हैं/ सोचने का विषय हैं? पिछले कुछ सालों से उत्तराखंड के पहाड़ी राज्यों में खेती कम होती जा रही है और बंजर खेत बढ़ते जा रहे हैं। कुछ छोटे मोटे प्रयोग जिन्होंने फल,सब्जी पे काम किया है उन्हें छोड़ कर बाक़ी सब बंजर-वीरान हैं। लोग खेतों को घास के लिए उपयोग कर रहे हैं। खेती कम करके गाय और भैंस पालने पे ध्यान दे रहे हैं। ठीक भी हैं। खेती में एक ओर मौसम की मार हैं दूसरी ओर जानवरों(बंदर, जंगली सुवर) का आतंक। अगर इन से बचकर फसल भी हों जाए तो मार्केटिंग जीरो हैं। कुछ ऐसा ही फल-सब्जी के पैदावार करने वालों के साथ भी हैं। मोदी जी केदारनाथ में उत्तराखंड को आर्गेनिक स्टेट बनाने की बात कर रहे हैं लेकिन मजे की बात ये है कि कि उत्तराखंड नैचुरली आर्गेनिक स्टेट है। ज़रूरत है उसके लिए सिस्टम बनाने की। मार्केटिंग का सिस्टम बनाने की। आजकल देहरादून में 2% कृषि लोन की चर्चा चल रही हैं। लेकिन किसान खेती ही नहीं करेगा तो लोन कैसा? पिछले साल दौलाघट में एक गोदाम में महंगी आर्गेनिक खाद रखी रही, जिसे सरकार फ्री में बाट रही थी। जो इक-आद लोग ले भी गए, उन्हें कोई प्रयोग के तरीके समझाने वाला नहीं था। ऐसे ही एक बार किसानों के लिए जिंक आया, जो खेत मे नमी कम करने का काम करता हैं, लेकिन फिर कोई बताने वाला नहीं था तो लोगों ने सूखे खेतों में डाल दिया और फसल खराब हो गई। बीज लगाने के बाद ऐसा हर बार होता कि बीज ख़राब हो जाता हैं। इसके दो कारण हैं एक पहाड़ी भूगोल आधारित बीज की अनुपलब्धता ओर दूसरा कृषि अधिकारियों का पहाड़ का न होना। जिस कारण वे यहां की परिस्थितियों को नहीं समझ पाते हैं। एक किसान के जीवन मे आज बहुत संघर्ष हैं सरकार जिसे बिना समझे कम करने की सोच रही हैं। आप किसानों की आय दोगुना करने की बात कर रहे हैं, यहाँ किसान ही नहीं बचे तो क्या होगा?

सुझाव-
1-उत्तराखंड में किसानी में बड़े बदलाव की जरूरत हैं, जिसमें एग्रिकल्चर से हार्डीकल्चर में शिफ़्ट होने की आवश्यकता है।
2- लोकल औऱ आउट ऑफ स्टेट मार्केटिंग पर विशेष ध्यान देना हैं।
3-किसानी मजबूरी नहीं फायदे का सौदा बनें।

सामुदायिक प्रयासों से किया कुलगाड़ में नौले को पुनर्जीवित


नैनीताल जिले के रामगढ़ ब्लाक में स्थित है कुलगाड़ गांव। स्थानीय निवासियों की माने तोए पहाड़ी गधेरे के किराने छोटे.छोटे खेतों के बीच बसे होने के कारण गांव का नाम कुलगाड़ पड़ा। यह गांव छोटा हैए जैसे कि लगभग 80 फीसदी उत्तराखंड के गावं हैए जहां केवल 23 परिवार रहते है। हल्द्वानी से अल्मोड़ा जाने वाले नेशनल हाइवे नंबर 87 से कुलगाड़ गांव दिखता तो पास में है लेकिन कुछ दूर टेडे.मेडे रास्ते से पैदल चलकर यहां पहुंचा जा सकता है। कुल साल पहले गांव के निवासी शहीद मेजर मनोज भंडारी को श्रद्धांजली देते हुए गांव में सड़क पहंुच पायी हैए जो अभी कच्ची है। स्थानीय बाजारए सुयालबाड़ी स्थित सड़क से गांव स्पष्ट दिखायी देता है। जहां छोटे.छोटे सीढ़ीनुमा खेतों से उपर की ओर बसे गांव को देखकर पहाड़ी गांवों को बेहतर समझा जा सकता है।
जल समिति

कुलगाड़ा गांव की सबसे खास बात हैए यहां की जल समिति एवं सरस्वती स्वयं सहायता समूह। जो महिला नेतृत्व आधारित हैए प्रत्येक में 9.9 सदस्य है जिसमें 5 महिलाएं और 4 पुरूष हैं। जल समिति मूलरूप से गांव में पानी के जुड़े मुद्दों को लेकर चिराग संस्था के सहयोग से बनायी गई। जो 2013 से इस गांव में प्राकृतिक जल स्त्रोतों के लेकर काम कर रही है। कुलगाड़ गांव की जलसमिति की अध्यक्ष सविता भण्डारी कहती है कि हमारे गांव में समिति 2013 से शुरू हुई और 2014 में काम शुरू किया। जिसमें पांच महिलाओं के साथ चार पुरूष भी हैं। सभी ने मिलकर नौले का जीर्णोधार का काम किया है। जलग्रहण क्षेत्र में भी काम हुआ हंै। जल समिति का अपना आर्थिक माॅडल भी है। समिति की कोषाध्यक्ष कंुती देवी के अनुसार हम सभी सदस्यगण सरस्वती स्वयं सहायता समूह में 50 और जल समीति में 10 रूप्ए प्रतिमाह जमा करते हैं। इसमें कुल 9 लोग होते है। एक और व्यक्ति बाहर से जुड़ जाता हैए इस प्रकार कुल 10 लोग द्वारा प्रतिमाह 100 रूप्ए जमा किए जाते हैं। इस जमा धन का उपयोग खालए गड्डों की सफाईए नौले की सफाई आदि कार्यों के लिए किया जाता है। समिति में पैसा जमा करने का एक ही उद्देश्य होता है ताकि वो पानी के काम को अपना समझ के करें। इस प्रकार जल समिति ग्रामीणों के बीच आपसी संचार का माध्यम बना है जिसकी सहायता से सामुदायिक कार्यों को संस्था द्वारा अंजाम दिया जाता रहा है।

विकास का चिराग

चिराग संस्था मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पिछले लगभग 30 सालों से ग्रामीणों के बीच काम कर रहा है जिसका मुख्य लक्ष्य शिक्षाए स्वास्थ्यए आजीविका और पेयजल विषयों को लेकर समुदाय को जागरूक किया जाएए उनका विकास किया जाए। इसी संस्था के माग्रदर्शन में कुलगांड़ के प्राकृतिक जल स्त्रोतों को पुर्नजीवित करने का काम हुआ हैं। जिसकी सबसे विशेषता इसका पूर्णतः समुदाय आधारित एवं महिला नेतृत्व प्रधान होना है। ग्रामीण जल स्त्रोतोंए जिसे स्थानीय भाषा में नौलाए धारा एवं पनेरा कहां जाता हैए के रिचार्ज पर काम किया गया है। यह प्रयास जितना वैज्ञानिक है उनका ही इसमें परंपरागत तकनीकों का प्रभाव हैए शायद यही वजह थी कि यह सफल भी रहा। चिराग संस्था में डेवलेपमेन्ट एसिसटेंट पद पर कार्यरत कृष्ण चंद भंडारी नौले को समझाते हुए कहते है कि आसपास के पानी को एक स्थान पर एकत्रित करने के लिए नाले का निर्माण किया जाता है। हमारे बुर्जगों ने स्थानीय पत्थरोंए मिटृी की मदद से पानी के स्त्रोतों को नौले का रूप दिया। किन्ही स्थानों पर मांस की दाल को पीसकर या फिर लाल मिटृी के माध्यम से नौले का निर्माण किया गया। स्थानीय दास्तकारों द्वारा नौले की आंतरिक बनाबट में सीढ़ी इसलिए बनायी गई ताकि पानी का तल बाहर की ओर न भागे एवं नौले के अंदर स्वच्छता भी बने रहे। कुलगाड़ के पनेरा नौले के उन्नयन के लिए 2013 से अरग्यम की मदद से चिराग द्वारा तकनीकी सहयोग एवं भूगर्भीय सर्वेक्षण के लिए एक्वाडेम पुणे ने सहायता दी। आज पांच साल बाद इसमें गर्मीयों के सीजन में 5 से 6 लीटर पानी एवं बरसात में 15 लीटर पानी रहता हैएजो गांव वालों के लिए पर्याप्त होता है।

पनेरा नौला
गांव के उत्तर मंे एक नौला हैए जिसे गाववासी पनेरा नौला कहते है। यह पानी के स्त्रोत के साथ ग्रामीणों के लिए परंपरा एवं संस्कृति का केन्द्र है। यहां के निवासियों की मान्यता है कि नौले के जल मे विष्णु का निवास स्थान होता है। शादी के बाद दुल्हा और दुल्हन नौले में जाते है और अपना मुकुट वहां स्थापित करके आते है। दुल्हन नौले के पानी को भरकर सभी परिवारवालों को पिलाती है। और जब भी गांव में कोई कथाए शीर्वाचन होता है उसकी सामाग्री का विषर्जन भी वही होता है। लेकिन जो आज से पांच वर्ष पूर्व सूखता जा रहा था। स्थानीय वरिष्ठ नागरिक श्री शेर सिंह भंडारी कहते है कि उन्होनें अपने जीवन के 95 साल में कभी नौले को सूखते हुए नहीं देखाए हां! ये जब से गांव में पाइप लाइन आयी है यह गर्मी के दिनों में सूख जाता है। शेर सिंह जी की ये बाते जल संस्थान द्वारा लगाई गयीं पाइप लाइनों की ओर इशारा कर रही है जो पहाड़ी गांवों में पेयजल मुहैया कराने के लिए किए गए अदूरदर्शी सोच है। पाइप लाइनें से किसी न किसी जल स्त्रोत के माध्यम से ही पानी आता हैए हर ग्राम प्रधान जब भी पानी के संकट की बात आती है तो पाइप लाइन तो लगवा देता है लेकिन जल स्त्रातों के जलस्तर को बढ़ाने की कोई नहीं सोचता है। हालांकि शुरूआत में कुल दिन पाइपों में पानी रहता है लेकिन गर्मी आने के साथ ही ये भी सूख जाते है। इसी संदर्भ में स्थानीय विशेषज्ञ कहते है कि अगर उत्तराखंड राज्य में पानी की आपूर्ति के लिए लगाए गई सभी पाइप लाइनों को आपस में जोड़कर चंाद तक पहुंचा जा सकता सकता है। इस बयान में सत्यता हो न हो लेकिन सवाल जरूर है।


सामुदायिक प्रयास

यह प्राकृतिक संशाधनों का उपभोग नहीं उपयोग करना चाहिए यह प्रकृति का साष्वत नियम हैए जिसे आज का मनुष्य नहीं समझ पा रहा है। कुलगाड़ जल समिति की संदर्भ व्यक्ति एवं पैराहाइड्रोसाइटिस्ट प्रेमा भंडारी कहती हैं कि हमारे गांव का नौला जो कुछ समय पहले सूख गया था उसके संवर्धन के लिए जल समिति ने काम किया है। एक समय नौले का डिस्चार्ज केवल 4 एलपीएम यानी लीटर प्रति मिनट रह गया था। जिसके लिए हमने सामुदायिक प्रयासों से उसके कैचमेन्ट के 7ण्3 हेक्टेयर में काम किया। जिसमें लगभग दो बार में छह हजार से ज्यादा पौधों की बुआई की थी। इसके अतिरिक्त कैचमेन्ट में कंटूर टैंकए खालए चैकडैमए परकूलेसन पीड बनाए गए। ये सभी कार्य समीति के माध्यम से ग्रामीणों के सहयोग से किया गया। यह काम इतना आसान नहीं था इसमें एक विवाद सामने आया जिसमें गांव के गधेरे के बीच स्थित नौले के कैचमेंट को लेकर आया। नौला कुलागाड़ गांव की जमीन में है। लेकिन इसका कैचमेन्ट एरिया दूसरे गांव की जमीन में है। आपस में चार.पांच महीने की मीटिंग के बाद उन्हंे हम ये बता पाए की स्त्रोत कितना जरूरी है। उनको भी लगा ये सही काम कर रहे है।

कुलगाड़ कैचमेन्ट एरिया में दो प्रकार के पत्थर है। एक है क्वाडजाईट और दूसरा फलाईट एवं यहां पत्थरों का उत्तरी पूर्वी ढलान है। क्वाटजाईटए यह कठोर होता है जो पानी को रोकता है। इसे स्थानीय भाषा में डासी पत्थर बोलते है। दूसरा फलाईट जिसमें अलग अलग परतें होती हैं। यह अपनी परतों में पानी को रोक के रखता है और धीरे धीरे छोड़ता है। फलाईट में फैक्चर यानी दरारें है जिसके द्वारा पानी धीरे.धीरे नौले की ओर जाता है। पहले हमारे नौले में 4 एलपीएम पानी था अब 14 एलपीएम रहता है। इसके साथ प्रतिमाह पानी को नापतें है और जांच करते है। इसके अम्लीयता और छारीयता की जांच करते है। चिराग संस्था के एरिया मैनेजर भीम सिंह नेगी कहते है कि समुदाय के माध्यम से इस कुलगाड़ के कैचमेन्ट एरिया में 2013.15 के बीच हमने खाल.चालए कंटूर ट्रन्चए वृक्षारोपण का काम किया है। जिसके काफी अच्छे परिणाम आए। ग्रामवासी गर्मी के मौसम मेें आग बुझाने के लिए अपने प्रयास भी करते रहते है। आज ग्रामीण पानीए जंगल को लेकर जागरूक हैं यही हमारे काम की सफलता है।



शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

पहाड़ के किसान दयानन्द जोशी की 45 साल की कहानी

Author: 
 मुकेश बोरा


दयानन्द जोशीदयानन्द जोशीउत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले में 25 परिवारों का छोटा सा गाँव है, गल्लाकोट। जहाँ रहते हैं 75 वर्षीय दयानन्द जोशी। अल्मोड़ा शहर से 32 किमी दूर, रानीखेत को जाने वाली रोड, गोविन्दपुर के पास पड़ता है दयानन्द का गाँव। वे लगभग 45 साल से सब्जी और फलों का उत्पादन कई कीर्तिमान स्थापित करते हुए कर रहे हैं। 15 किलो की मूली, 5 किलो की गड़री (अरबी की प्रजाति की सब्जी) के लिये उनको सम्मानित भी किया जा चुका है और मूली की इसी बीज को दयाकेसरी नाम रखने की प्रक्रिया भी चल रही है।

रोड से कुछ दूर पैदल ऊपर चढ़ने के बाद, लोगों से पूछते हुए मैं वहाँ पहुँचा। संयोगवश उनका बेटा रास्ते में घास काटते हुए मिल गया। रोड से थोड़े ऊँचाई पर उनका पुराने डिजाइन में बना घर था और चारों ओर खेत थे। उनसे मेरी पहली मुलाकात पॉलीहाउस में हुई, जहाँ झुकी हुई कमर से वे घास साफ कर रहे थे। मैंने प्रणाम किया ही था कि वे बोल पड़े, कुछ नहीं हो रहा है इस बार, पानी की कमी से सब सुख गया है, ऐसा कहते हुए वे मुझे खेत से आँगन में ले गए।

मेरे मन में उनके रंग-रूप और घर को लेकर अनेक जिज्ञासाएँ थीं, बड़े किसान हैं तो घर भी अच्छा ही होगा। घर की हालत और उनके परिवार की स्थिति देखकर निराशा हुई और मन में अनेक सवाल भी उपजे। पहाड़ी डिजाइन में बने घर में वे अपने बेटे और पोते के साथ रहते थे। पोता 11वीं में पढ़ता था, जिसे लेकर उनकी काफी शिकायतें थीं।

कोई खेती नहीं करना चाहता


इतनी उम्र होने के बाद भी वे खेती का सारा काम स्वयं ही करते हैं। वे कहते हैं कि खेती-किसानी आज के जमाने में गुजरे वक्त की बात हो गई है। गाँव के लड़के दिल्ली जैसे शहरों में जाकर सात-आठ हजार कमाते हैं लेकिन अपने खेतों में काम करके फल, सब्जी उगाना नहीं चाहते।

जब मैंने पूछा कि आप ये काम कब से करते आये हैं तो उन्होंने कहा कि जबसे मैंने होश सम्भाला तब से यही काम कर रहा हूँ। मेरे पास कोई डिग्री नहीं है बस मेरी जिज्ञासा, प्रयोगों एवं पिताजी के मार्गदर्शन से सिखता आया हूँ। वे आगे कहते हैं, 20-25 साल पहले यहाँ पास के कस्बों, दौलाघट और गोविन्दपुर में कोई दुकान नहीं थी, मैं सारी सब्जियाँ बेचने के लिये रानीखेत और सोमेश्वर की बाजार में जाता था। इतनी मेहनत करने के बाद भी यह लाभ का सौदा होता था। इस पूरे इलाके में मैंने पहली बार गोभी लगाई। वरना यहाँ के लोगों ने गोभी को बस दुकानों में ही रखे देखा था। जब मैंने उनसे पूछा कि आप तो सब्जियों के विशेषज्ञ हैं तो यहाँ सारे गाँव वाले सब्जी, फल का उत्पादन करते होंगे। वे बोले बेटा, उत्पादन तो दूर की बात ये लोग तो मुझे भी अच्छे से काम नहीं करने देते। इन्हीं लोगों की वजह से मैं पत्थर की दीवार लगा रहा हूँ, जिसमें भी इनको आपत्ति है इसलिये आजकल इसका काम रुका हुआ है।

मैंने आसपास के कई लोगों को कहाँ कि मैं आपको बीज लाकर दूँगा और साथ ही बताऊँगा भी कि कैसे लगाना है। विडम्बना देखो भूटान, नेपाल, सिक्किम, दार्जिलिंग के लोग मेरी बात मानकर काम कर रहे हैं और गाँव वालों के लिये घर की मुर्गी दाल बराबर है। इसी दौरान वे मुझे परिसर घुमाने ले गए, जहाँ उन्होंने गोभी, प्याज, टमाटर, मूली के अतिरिक्त अमरूद, अखरोट के पेड़ दिखाए। इसके अलावा उनके पास केरल से लाई इलाइची, हिमाचल से लाए गए जापानी फल जैसे अनेक पेड़ थे, जो इस वातावरण में नहीं होते थे जिसे उन्होंने जिज्ञासा एवं प्रयोग के नाते लगाया था।

पानी की कमी विकट समस्या


पानी की कमी की बात को उन्होंने कई बार कहा कि पहले तो नियमित पानी रहता था, पर पिछले कुछ सालों से पानी कम आता है। दयानन्द जी ने अपने घर में पानी के दो कनेक्शन लिये हुए हैं। उन्होंने पानी की कमी के कारण ही अपने पैसों से 18 मीटर चौड़ा 15 मीटर लम्बा और 6 मीटर गहरा मजबूत कंकरीट का तालाब बनाया हुआ था। जो 2012 की आपदा के दौरान थोड़ा टूट गया था जिसके कारण उसमें अब पानी ज्यादा दिनों तक नहीं रुक पाता था।

विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसन्धान केन्द्र


जब मैंने सरकारी योजना एवं आर्थिक सहायता पर सवाल पूूछा तो वे उत्तेजित होकर बोले, जो मैंने कमाया था, सब इन खेतों में लगा दिया, कहीं से आर्थिक सहायता नहीं मिली। उनके खेत में लगे विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसन्धान केन्द्र के बोर्ड को देखकर मैंने पूछा कि क्या ये कुछ सहायता करते हैं?

अपने खेतों में फसल दिखाते दयानन्द जोशीअनुसन्धान केन्द्र के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक भट्ट का नाम लेकर बोले कि एक बार मैंने उनसे बीज माँगे और उनके रख-रखाव के लिये संस्थागत सहायता की बात कही लेकिन उनका कहना था कि हमारा काम अनुसन्धान करना है। बस एक मर्तबा यहाँ गोभी के विशेष बीजों को प्रयोग के तौर पर लगाया गया, तब नियमित अन्तराल में अनेक वैज्ञानिक आते थे और जब प्रयोग खत्म हुआ तो उनका आना और उनका सहयोग भी बन्द हो गया। पहले मैं उनकी मीटिंग में जाया करता था लेकिन समय और स्वास्थ के कारण अब नहीं जा पाता हूँ।

रानीखेत के एनजीओ, लोक चेतना मंच ने मेरा बहुत उपयोग किया। हालांकि मुझे सम्पूर्ण भारत के साथ भूटान की यात्रा भी कराई। वे मुझे विभिन्न जगहों में ले जाकर खेती की परम्परागत तरीकों पर बताने को कहते थे कि कैसे आसपास की चीजों से कीटाणुनाशक बनाया जा सकता है, कौन सी जगह पर क्या हो सकता है आदि आदि। पूरे साल भम्रण के बाद जब मैंने उनसे अपने खेतों की चारों ओर पत्थर की दीवार के लिये सहयोग करने को कहाँ तो उन्होंने मना कर दिया। तब से आज तक न वे यहाँ आये और न मैंने उनसे बात की। न जाने उन्होंने मुझसे कितने रुपए कमाए।

तमाम बातों के बाद जब मैंने उनसे कहा कि आखिर वे कौन सी वजह है कि आप 45 सालों के बाद भी इस व्यवसाय को आस-पास के लोगों तक नहीं पहुँचा सके? वे बोले ऐसा नहीं है कि कोई प्रेरित नहीं हुआ, जो व्यक्तिगत रूप से जुड़ा उसे मैंने सहयोग किया। लेकिन आसपास के गाँव का माहौल खेती के सकारात्मक नहीं हो पाया। इसकी सबसे बड़ी वजह सरकारी संस्थाओं का असहयोग है। जब वे मुझे प्रोत्साहन नहीं दे सकते हैं, तो वे एक नए किसान की क्या सहायता करेंगेे।
http://hindi.indiawaterportal.org/Dayanand-Joshi

मैदानी क्षेत्र में विकास, पहाडी़ इलाका है अब भी निराश


उत्तराखंड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर देश का 27 वां राज्य बना। इस पहाड़ी राज्य का कुल क्षेत्रफल 53.483 वर्ग किमी है, जो भारत के कुल क्षेत्रफल का 1.63 प्रतिशत है। राज्य की जनसंख्या 1.01 करोड़ है जो देश की कुल आबादी का 0.83 प्रतिशत है। 53,483 वर्ग किमी कुल क्षेत्र में से 34,650 वर्ग किमी लगभग 66 प्रतिशत वन क्षेत्र है। भारत के उत्तर भारत में स्थित राज्य का सामरिक रूप से भी महत्वपूर्ण है इसकेे उत्तर दिशा में चीन व तिब्बत और पूर्व में नेपाल देशों से सीमा लगती है। गंगा यमुना नदियों के उद्गम के साथ राज्य में चार धामों में बद्रीनाथ जैसे पवित्र धार्मिक स्थल है। विश्व विरासत में स्थान पा  चुका फूलों की घाटी भी राज्य में है। इसके अतिरिक्त राज्य प्रमुख औषधियों एवं जैवविविधता का भंडार है।
उत्तराखंड दो मंडलों में विभाजित है। एक कुमाउ और दूसरा गढ़वाल। यहां कुल 13 जिले है, जिसमें 4 मैदानी और 9 पहाड़ी है। कुल क्षेत्रफल का 90 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी है। लगभग 30 लाख से ज्यादा शहरी आबादी है और 70 लाख से ज्यादा ग्रामीण है। यहां कुल आबादी में 30.55 शहर है और 69.45 प्रतिशत गांव है।
विस्थापन- 
2000 से 2011 के बीच के आंकडों के आधार पर जनसंख्या में वृद्धि असमानता दिखती है। एक ओर जहां चार मैदानी जिलों नैनीताल-25.2, देहरादून-32.48, उधमसिंह नगर-33.4 और हरिद्वार-33.16 प्रतिशत जनंसंख्या की बढ़ोतरी हुई है। वही इन दस सालों में अल्मोड़ा-1.73 और पौढ़ी गढ़वाल -1.51 प्रतिशत जनसंख्या में गिरावट देखी गई। जो लगातार हो रहे विस्थापन की ओर इंगित करता है। विस्तापन के प्रमुख कारणों में बेरोजगारी और शिक्षा के उचित संशाधनों का अभाव है। यहां चार प्रकार के विस्थापन देखने को मिलते है, जिनमें रोजगार के लिए पुरूष का और शादी के कारण महिलाएं का राज्य से बाहर जाती है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग अपने गावों को छोड़कर आसपास के शहरों में आकर रहने लगते है जिसे अंर्तराज्यीय विस्थापन कहा जाता है। साथ ही कुछ लोग एक जिले से दूसरे जिले में कतिपय कारणों से विस्थापित हो जाते है और इनमेें से कुछ देश के बाहर शिक्षा दिक्षा के लिए विस्थापन करते है। विस्तापन राज्य की लगातार खतरनाक हो रही समस्या है।
जनसंख्या की असमानता-
राज्य में जनसंख्या की असमान वितरण देखने को मिलता है। एक ओर जहां उत्तरकाशी जिले में कुल राज्य की कुल जनंसंख्या का 3.26 प्रतिशत आबादी निवास करती है और जिले का जनसंख्या धनत्व 41 वर्ग किमी है। वहीं दूसरी ओर राज्य के एक अन्य जिले हरिद्वार की जनंसंख्या 19.05 प्रतिशत है और वहां का जनंसंख्या धनत्व 817 है। ध्यात्वय हो कि उत्तराख्ंाड का जनसंख्या धनत्व औसत 189 और देश का औसत धनत्व 382 है। इस प्रकार  एक आकड़े के अनुसार 9 पहाड़ी जिलों की जनसंख्या 38.43 प्रतिशत है और 4 मैदानी जिलों की आबादी का प्रतिशत 61.57 है। इस असमान जनसंख्या वितरण को असमान संशाधनों के वितरण के रूप में भी देखा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत आवश्यकताओं की कमी रहती है वही मैदानी जिलों में रोजगार के साधनों के साथ रोड़, स्कूल, चिकित्सालयों की उचित व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त गावों से लगातार लोगों का पलायन हो रहा है। 2001 में 16,826 गांव थे जो 2011 में 16,793 गांव हो गए  है और भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
असमान आर्थिक वितरण- 
हालिया वल्र्ड बैंक ने डीआईपीपी के साथ मिलकर निकाली व्यापार सुगमता रिर्पोट के आधार पर उत्तराखंड राज्य अपने पिछले स्थान 23 से 9 वे नंबर पर आ गया है। एसोचैम के आर्थिक अनुसंधान ब्यूरो की रिर्पोट में उत्तराखंड एक दशक में उद्योग और सेवा क्षेत्रों में सबसे आगे रहा है। ताजा अध्ययन के अनुसार 2004-05 से 2014-15 में उद्योग क्षेत्र में 16.5 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र में 12.3 प्रतिशत सालान वृद्धि हासिल की है। जो साल प्रतिशत की औसत सालाना वृद्धि के मुकाबले कही आगे है। उत्तराखंड सीएजीआर में शीर्ष पर है। इस अवधि के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में उत्तराखंड का योगदान 0.8 प्रतिशत से बढ़कर 1.2 तक पहुच गया है। इन सब के बावजूद पिछले दस सालों में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। यह 22 प्रतिशत से लुढ़कर 9 प्रतिशत पर पहुंच गया है। राज्य की 75 प्रतिशत से ज्यादा आबादी आज भी कृषि पर निर्भर करती है। उत्तराखंड औषधीय पौधों के मामले में बहुत महत्वपूर्ण है यहां 175 प्रकार की विरल औषधी मिलती है। इसके अतिरिक्त फल, सब्जी और औषधी उत्पादन की दृष्टि से राज्य की भूमि उर्वर है। इन सब के बावजूद यह वानिकी के क्षेत्र में हिमालच और अन्य राज्यों की तुलना में काफी पीछे है।
मैदानी जिले हरिद्वार, नैनीताल, उधमसिंह नगर और देहरादून जिलों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान है। उघोग निदेशक उत्तराखंड के आंकड़े के अनुसार दिसंबर 2012 में 230 उघोग थे जिनमें 274,501.81 करोड़ का निवेश किया गया और जो 85,333 लोगों को रोजगार देती थी। इन उघोगों का उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र तक सिमित होने की वजह से 90 प्रतिशत पहाड़ी भाग पिछड़ता जा रहा है। एक ओर जहां आकड़ों के आधार पर राज्य अव्वल बना है वही दूसरी ओर इन पर गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि यह मात्र चार जिलों के तक सिमित है। राज्य में पर्यटन एक बड़ा आर्थिक माध्यम है। पर्यटन 2013-14 में 20.03 लाख से 2014-15 में 22.09 लाख हो गया है। चार धाम  और पहाड़ी क्षेत्रों में धूमने के लिए हर साल सैलानी उत्तराखंड आते है। यह धार्मिक पर्यटन के साथ स्वास्थ्य, साहसिक पर्यटन का मुख्य क्षेत्र रहा है। लेकिन दूर्भाग्य है कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से पर्यटन के लिए सुनियोजित माडॅल नहीं बन पाया है।
कारण 
उत्तराखंड के बदहाल हालत के कारणों की बात करें तो सबसे पहले राजनैतिक अस्थिरता है। 16 सालों में राज्य 8 मुख्यमंत्री देख चुका है। जिसमें नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए है। इसके आलावा एक बहुत बड़ा कारण के उत्तर प्रदेश के माडॅल पर पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के विकास करने की बात की जा रही है। भले ही उत्तर प्रदेश से अलग हुए 16 साल हो गए है परंतु आज भी देहरादून में बैठी सरकार वही काम कर रही है जो लखनउ में बैठकर करती थी। 1979 में उत्तर प्रदेश के तत्कालिन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव ने कहा था कि क्या प्रदेश में पहाड़ भी है? इन चितांओं को ध्यान में रखकर ही 2000 में अलग उत्तराखंड राज्य की स्थापना की गई। लेकिन हालत आज भी जस की तस है। 90 प्रतिशत पहाड़ी राज्य की राजधानी देहरादून होना एक और बड़ा बाधक है विकास में। सन् 1984 में जब सबसे पहले अलग उत्तराखंड राज्य की मांग उठी थी तभी से चमोली जिले में स्थित गैरसैण को राजधानी बना दिया गया था। लेकिन आज भी यह मामला राजनितिक घोषणा पत्रों में लटका पड़ा है।
आज पहाड़ी जिलों में लोंगों में निराशा है भय है। निराशा सरकार से और भय प्राकृतिक आपदाओं का । इस वजह से वे अपने घरों को छोड़कर कही भी जाने को मजबूर है। इसके चलते राज्य में भूताहा गावों की संख्या बढ़ती जा रही है। खेत बंजर हो रहे है घर खाली हो रहे है। राजनेताओं के बीच एक और वर्ग है जो ठेकेदार है। चाहे वो भूमाफिया हो, खनन हो, स्कूल, रोड़ के निर्माण की धांधली हो इनके पीछे ये ही गिरोह है। जो राज्य में दीमक की तरह काम कर रहा है। प्राकृतिक संशाधनों से भरापूरा राज्य उत्तराखंड बेहाल हो रहा है तो उसमें राजनेताओं के साथ ठेकेदारों का भी बहुत बड़ा हाथ है।
क्या है जरूरी
आज राज्य में सामाजिक एवं सांस्कृतिक बनावट के साथ विकास करने की जरूरत है। साथ ही राज्य की पर्यावरणीय चिंता के साथ विकास के माडॅलों का नियोजन करना चाहिए। फल, सब्जी उत्पादन के साथ सरकार को पर्यटन एवं कुटीर उघोगों को बढ़ावा देकर राज्य में बेरोजगारी की चिंता से लड़ा जा सकता है। इस सब के साथ राज्य में दबाव समूहों, गैर सरकारी संगठनों को भी सामाजिक एवं राजनैतिक चेतना जगाने का काम करना चाहिए।

सोमवार, 1 अगस्त 2016

सच्चिदानंद भारती, चाल-ताल-खल (उफ्रेखाल,पौड़ी से)

शोध यात्रा में आज का दिन(18 जुलाई) सबसे विशेष रहा। झमाझम बरसात के बाद, सुबह 9 बजे पौड़ी से लगभग 120 किमी दूर उपरेखाल पंहुचा। बैजोव, उपरेखाल से 25 किमी पहले, से आगे आते ही माहौल में त्वरित परिवर्तन महसूस हुआ। चारों ओर खूबसूरत फसलों से लहलहाते सीढ़ीदार खेत, बाँज,उतीश के पेड़ों से भरी घाटी, खेतों में काम करते लोग। ये सब देख के लगा,मानों भगवान ने कुम्हार की तरह खुद अपने हाथों से इसे तराशा हो लेकिन यह एक इंसान का लोगों के सहयोग से वर्षों की मेहनत का फ़ल हैं। कुछ दूर चलने के बाद वो प्रकृति का कुम्हार, जंगलों को बनाने वाले, पानी पैदा करने वाले श्री सचिदानंद भारती जी मिले। जितने महान काम, उतने सरल इंसान।
आज सारा दिन उनके साथ बिताया, आसपास के जंगलों में घुमा, ताल-खाल के प्रयोग देखें, गाड-गंगा नदी को देखा, उनकी कहानी जानने की कोशिश की। इतना सब देखकर लगा कि एक इंसान क्या क्या कर सकता हैं?और अगर वो ठान ले तो सब कुछ कर सकता हैं।
20 year, 30000 taal-khal,connected 150 villages of pauri,chamoli,almora district,
, recharge Daard Ganga river and many more.
...भारती जी की शेष बातें थीसिस में।
...मुकेश बोरा।




पर्यावरणविद श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी से मुलाकात के कुछ अंश

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।
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आज 29 जुलाई 2016 को महात्मा गाँधी, श्रीदेव सुमन, पं श्रीराम शर्मा, गौरा देवी जैसे अनेक महापुरुषों को एक शरीर में जीवंत रूप में देखने का सौभाग्य मिला। 89 वर्षीय पर्यावरण गाँधी, पद्म विभूषण श्री सुन्दरलाल बहुगुणा जी ,जो चिपको आंदोलन के सूत्रधार रहे ,के दर्शन का दिव्य अवसर मिला। थोड़ी देर की बात चित में उन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पानी, जवानी और पर्यावरण से सम्बंधित समस्याओं को सूत्र रूप में बताया। अपनी जवानी के दिनों को याद करते हुए उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में मीलो की जागरूकता यात्रा का जिक्र किया। जो आज गांव छोड़ रहे युवाओं को प्रेरणा देने का काम कर सकता हैं।
उनके शब्दों में-“अंग्रेजों ने पैसा कमाने के लिए पहाड़ में चीड़ भर दिए। जिसने मिट्टी को एसिडिक(जहरीली) कर दिया और उसकेे कारण लगातार पहाड़ो में पानी के स्त्रोत सूख रहे है। आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। जीवन जीने का साधन पानी और मिट्टी ख़त्म हो रही है। राज्य में जहाँ घाटियों में थोड़ा समतल ज़मीन थी, वह बाँध बनाकर नष्ट कर दी गयी हैं। इन सब वजहों से यहां का युवा पहाड़ छोड़ के बाहर जा रहा हैं।यह देश के लिए अच्छा नहीं है, युवा नही टिकेगा तो चीन उस क्षेत्र में हमला करने का साहस करेगा। डिफेंस की दृष्टि से नवयुवकों का पहाड़ छोड़कर जाना ख़तरनाक हैं। यहाँ की इकॉनमी मनीआर्डर इकॉनमी है,जिसे बदलने की जरूरत है।
पहाड़ का विकास बहुत आसान है। जिसके लिए मेरे दो सूत्र है.. चीड़ को हटाओं.. नीचे बहते पानी को खिंच कर पहाड़ की चोटी तक लाओ। यह युवाओं के लिए चुनौती हैं। यह दुर्भाग्य ही हैं कि आजादी के बाद भी सरकारें उत्तराखंड का लैंड सिस्टम नहीं बदल पायी। आज सरकारों के आदमी देहरादून से ऊपर जाना ही नहीं चाहते। अगर जाएंगे नही तो पहाड़ को कैसे जानेंगे। आज जरूरत है पहाड़ के प्राकतिक सौंदर्य को बहाल किया जाय। सैलानी आये और इस दिव्य निर्माण का सुन्दर एहसास कर सकें।”
10मिनट की बात चित में वे अपने बिगड़े स्वास्थ्य से इतर एक युवा की भांति, जोश और उम्मीद के साथ बोले। जो हर युवा के लिए प्रेरणादायी होगा


सोमवार, 30 नवंबर 2015

पहाड़ की नारी पहाड़ सी नारी ...

            वो स्त्री ही है जो पहाड़ के पहाड़ जैसे जीवन में प्रसन्नता पूर्वक रहती है।

मैं जब भी अपने मां को देखता हूं तो मुझे चेहरे की झुर्रियों के बीच साहस और हिम्मत दिखायी देती है।

आजकल रात जल्दी होने लगती है और पहाड़ी इलाकों में ठण्ड भी बहुत होती है। दीपावली के बाद से ही सुबह शाम ठण्डक का अहसास होने लगता है। अबकी बार जब में अपने गांव गया, तो फिर से वही बचपन के दिन याद आ रहे थे। मां अक्सर सूरज अस्त होने के बाद ही खेत से घर आती थी लेकिन आज वो जल्दी आ गयी। शायद किसी ने उसे मेरे आने की खबर खेत तक पहुचां दी थी। पहाड़ी गांव में घरों के बीच कितनी भी दूरी क्यों न हो लेकिन उसके बीच जुड़ाव और वार्तालाप में काफी सघनता होती है। जो आज शहरों में देखने को कम मिलती है। इतनी ठंड में मां जब घास का डेर लेकर आ रही थी तो उसे पसीना आ रहा था। वो थक चुकी थी लेकिन काम खत्म नहीं हुआ था। अभी रात का खाना, घर में पानी रखना और भी बहुत काम बचे थे। वह बिना थके बिना रूके कमर को झुकाए सूरज के साथ, सूरज के बाद भी पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियों का पालन हंसते हुए करती है। वो स्त्री ही है जो पहाड़ के पहाड़ जैसे जीवन में प्रसन्नता पूर्वक रहती है। रोजाना पानी, ईधन, चारा के लिए कई मील का सफर तय करती है। इसके साथ नामकरण, विवाह, पर्व-त्यौहारों एवं रिश्ते नातों की डोर को मजबूती से संभाले हुए वह पहाड़ की सास्कृतिक विरासत को बचाए हुए है। 

पहाड़ों में अमूमन लोग जल्दी सो जाते है। लेकिन टीवी के आ जाने के बाद इसमे कुछ बदलाव आए है। सुबह की ताजी ठंडी हवा के साथ एक दिनचर्या शुरू होती है। जानवरों को घास देना, दूध निकालना और आंगन की सफाई करने से कार्य प्रारम्भ होता है। उनके लिए मौसम मायने नहीं रखता, मायने रखता है तो जिम्मेदारी और काम। इसी सिद्धान्त के साथ वो दिन भर बिना रूके लगी रहती है। कमजोर शरीर होने के बावजूद भी उनका संकल्प पहाड़ की तरह होता है। चाहे रात हो या दिन, धूप हो या बारिश, पेड़ हो या पहाड़ वो हरदम तत्पर रहती है। अपनी भूमि से लगाव उसकी सबसे बड़ी खूबी है, आज इसी चीज की समाज में कमी देखने को मिलती है। पहाड़ घूमने वाले के लिए जितना खूबसूरत हैं, उतना ही कठिन वहां के निवासियों के लिए होता है। उत्तराखंड का लगभग 90 प्रतिशत भाग पहाड़ी है। जिस कारण यहां के पुरूषों को रोजगार के लिए अक्सर घर से दूर मैदानी भागों में जाना पड़ता हंै। ऐसे में परिवार की पूरी जिम्मेदारी महिला पर आ जाती है। घर परिवार, बुर्जगों की देखभाल, जानवरों की चारें की व्यवस्था के साथ साथ रिश्ते नातों को निभाना भी उसी का काम रहता है। वो सुबह से रात तक परिवार की धुरी में घुमती रहती है। मैं जब भी अपने मां को देखता हूं तो मुझे उसके चेहरे की झुर्रियों के बीच साहस और सर्मपण दिखायी देती है। क्योंकि पहाड़ों में महिलाएं को अपने परिवार की खातिर माता और पिता की भूमिका को निभाना पड़ता है। एक ओर जहां वह घर से खेत तक का सारा काम करती है वही वह बच्चे के स्कूल से लेकर बुर्जेगों की दवाओं का भी ख्याल रखती है। न ज्यादा उम्मीद और न ज्यादा चाहत बस थोड़े से अरमान की परिवार, गांव खुशहाल रहे। सही मायने में देखे तो वो त्याग की मूर्ति है। कहते भी है की पहाड़ की औरतों की कभी जवान नहीं हो पाती क्योंकि या तो वोे किशोरावस्था में होती है या फिर विवाह के बाद जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए बुर्जग हो जाती है। कुल साल पहले के एफएओ के एक अध्ययन के अनुसार एशिया में सबसे ज्यादा काम हिमालयी क्षेत्र महिलाएं करती है। हिमालयी क्षेत्र में एक पुरूष प्रतिवर्ष प्रति हेक्टेअर औसतन 1212 घंटे और महिलां 3485 घंटे काम करती है। यानी महिला पुुरूष के काम का अनुपात 294 अनुपात 101 का है। कृषि में महिलाओं का योगदान 60 से 80 और अन्य गतिविधियों में 60-80 प्रतिशत तक रहता है। इसके अतिरिक्त अध्ययन मेें बताया गया है कि महिलाएं ही हिमालयी क्षेत्र के विस्थापन की समस्या को रोक सकती है। 

आज समाज मेें एक ओर जहां उपभोगक्तावाद के दौर में नारी की पवित्रता पर आंच आयी है, उसे केवल विज्ञापन की वस्तु के तौर पर ही देखा जा रहा है। ऐसे वक्त में पहाड़ी क्षेत्र में महिलाएं अपने कर्तव्य पथ पर पूरी निष्ठा के साथ लगी रहती है। उसकी इसी विशेषता के कारण यहां की सामाजिक संरचना में उसका एक अनूठा योगदान है। पहाड़ी क्षेत्रों में विशेषतौर पर उत्तराखंड की बात करें तो महिलाओं की अमर गाथा की अनेक कहानियां लोगों की जुबान पर आज भी जीवंत है। जहां देवी स्वरूपा नारियों ने हर मोर्च पर परचम लहराया है। उत्तराखंड के अतीत में सबसे पहले रानी कर्णावती का उल्लेख मिलता है जिन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना से लोहा लिया। वीरबाला तीलू रौतेला, मालू रौतेला आदि वीरांगनाओं का वर्णन केवल लोक गीतों में ही मिलता है। 1805 से लेकर 1815 के बीच उत्तराखंड राज्य में गोरखा राज रहा। उस दौरान सबसे ज्यादा परेशानी यहां की महिलाओं का ही हुआ। इस दौर में अपने साहसिक कारनामों के कारण कोलिण जगदेई को आज लोकदेवी के रूप में पूजा जाता है। इसी क्रम में आजादी के दौर में विशनी देवी शाह, जिन्हे पहली बार आजादी के लिए जेल जाना का अवसर प्राप्त हुआ। यहां महिलाओं ने पुरूषों से एक कदम आगे रहकर परिवार, समाज, राजनीति, पर्यावरण हर क्षेत्र में अपना योगदान दिया है। उत्तराखंड में ऐसे अनेक उदाहरण है। चिपकों आंदोलन की सूत्रधार रैणी गावं की गौरा देवी को तो पूरी दुनियां जानती है जिन्होंने पर्यावरण और सामाजिक कुरितियों के खिलाफ र्मोचा खोला था। पहाड़ की तीजनबाई के नाम से प्रसिद्ध लोक गायिका कबूतरी देवी ने गायन की कोई शिक्षा नहीं ली लेकिन अपने गायन के माध्यम से हमेशा सामाजिक चेतना जगाते रही। इसके अतरिक्त राज्य आंदोलनकारी सुभाषिनी बर्थवाल, भारत की प्रथम महिला एवरेस्ट विजेता पद्मश्री बछेन्द्रीपाल, द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित हंसा मनराल शर्मा, क्रिकेटर एकता विष्ट, समाजसेवी वंदना शिवा , राज्य निर्माण आंदोलन में कौशल्या डबराल, सुशीला बलूनी, सामाजिक चेतना जागरण मेें मंगलादेवी उपाध्याय, गांधीजी की शिष्या सरलादेवी ने पर्वतीय महिलाओं के कल्याण के लिए कौसानी में लक्ष्मी आश्रम नामक संस्था की स्थापना की, नशा मुक्ति आंदोलन में कुंतीदेवी वर्मा, तुलसी रावत, दुर्गावती पंत  ने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त आदि नामों के साथ यहां निवास करने वाली हर वो मां, बहन, बेटी, जिसने इस खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र को सींचने में अपना योगदान दिया है।

 ऐसी महान नारियों के कारण ही आज हिमालयी राज्य की आवोहवा में वो सुगंध है जिसकेा देश के हर कोन का इंसान महसूस करना चाहता है। वास्तव में नारी समाज की शिल्पकार होती है। कहा भी जाता कि जब एक पुरूष शिक्षित होता है तो एक व्यक्ति ही शिक्षित होता है लेकिन एक महिला के शिक्षित होने से पूरी पीढी़ शिक्षित हो जाती है। लेकिन इस सब के बाबजूद भी नारी को वो सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी वे वास्तव में हकदार रही है।


शनिवार, 26 सितंबर 2015

गावों से दूर रहकर कहां जाएगें हम ?

      गावों के बिना भारत की कल्पना वैसे ही है, जैसे जड़ के बिना किसी पेड़ के अस्तित्व की। आजादी के समय भारत की कुल आबादी का 83 प्रतिशत गांव थे, वही आज यह घटकर 68 प्रतिशत रह गए हैं। इसके विपरित शहरों की आबादी 17 प्रतिशत से बढ़कर 31 प्रतिशत हो गई हैं। गावों से लगातार दूर जाने की इस परंपरा से एक ओर जहां गांव खाली हो गए है, वही दूसरी ओर शहरों में जनसंख्या विस्फोट की समस्या लगातार बड़ती जा रही है। 
भारत गावों में बसता है यह मात्र एक वाक्य नहीं है, बल्कि इनका प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व रहा है। गांव, भारत जैसे देश में अर्थव्यवस्था के लिए एक सशक्त माध्यम रहे है, जो अनाज, फल, सब्जी, दूध एवं अन्य अनेक उत्पादों का प्रमुख स्त्रोत है। लेकिन आज स्थिति लगातार विपरित होती जा रही हैं। आकड़ों के अनुसार शहरों में रहने वाले 40 प्रतिशत से ज्यादा परिवार मात्र एक कमरे में रहकर ही अपना जीवन काट रहे हैं। इसके बावजूद भी लोग रोजगार एवं पढ़ाई के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यह पलायन कुछ हद तक विकास एवं वृद्धि के लिए है, लेकिन पलायन के स्थायी रूप ने इसे समस्या बना दिया है। वैश्वीकरण के बाद शहरों एवं गावों के बीच की बड़ती खाई की ने एक नए विवाद को जन्म दिया है। जो हमारे सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना को आघात पहुंचा रहा हैं। नई पीढ़ी के मन में भारतीय संस्कृति के प्रति उदासीनता एवं हर रोज पनपते नए अपराधों इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सांस्कृतिक पतन, मानवीय मूल्यों के ह्रास एवं पाश्चात्य संस्कृति के प्रति बढ़ती रूचि भी इसके ही परिणाम हैं।


गांव में दादी, नानी की कहानी तो होती ही थी, साथ में जीवन जीने के सूत्र भी दिये जाते थे। लेकिन आज गांव से लोग भाग रहे है या कहे वे मजबूर है, भागने के लिए। मूलभूत आवश्यकताओं की कमी, बेरोजगारी, शहरों के प्रति अत्यधिक रूचि एवं सांस्कृतिक आधार कमजोर पड़ने की से यह पलायन और बड़ गया हैं। लेकिन हमें इस बात को सोचना होगा की इस दौड़ का अंतिम बिंदु वही है जहां से यह दौड़ शुरू हुई थी, यानी गांव, यहां से दूर रहकर हम कहां जाएगे। एक न एक दिन तो वापस आएगे, अपने मूल की ओर, अपने जड़ो की ओर।

उत्‍तराखंड के विकास के लिए सुझाव- आदर्श कुटीर योजना

पहाड़ के विकास का मॉडल उसकी मूल प्रकृति से जुड़ा होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए काम किए जाएं। लोगो...