क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।
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आज 29 जुलाई 2016 को महात्मा गाँधी, श्रीदेव सुमन, पं श्रीराम शर्मा, गौरा देवी जैसे अनेक महापुरुषों को एक शरीर में जीवंत रूप में देखने का सौभाग्य मिला। 89 वर्षीय पर्यावरण गाँधी, पद्म विभूषण श्री सुन्दरलाल बहुगुणा जी ,जो चिपको आंदोलन के सूत्रधार रहे ,के दर्शन का दिव्य अवसर मिला। थोड़ी देर की बात चित में उन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पानी, जवानी और पर्यावरण से सम्बंधित समस्याओं को सूत्र रूप में बताया। अपनी जवानी के दिनों को याद करते हुए उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में मीलो की जागरूकता यात्रा का जिक्र किया। जो आज गांव छोड़ रहे युवाओं को प्रेरणा देने का काम कर सकता हैं।
उनके शब्दों में-“अंग्रेजों ने पैसा कमाने के लिए पहाड़ में चीड़ भर दिए। जिसने मिट्टी को एसिडिक(जहरीली) कर दिया और उसकेे कारण लगातार पहाड़ो में पानी के स्त्रोत सूख रहे है। आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। जीवन जीने का साधन पानी और मिट्टी ख़त्म हो रही है। राज्य में जहाँ घाटियों में थोड़ा समतल ज़मीन थी, वह बाँध बनाकर नष्ट कर दी गयी हैं। इन सब वजहों से यहां का युवा पहाड़ छोड़ के बाहर जा रहा हैं।यह देश के लिए अच्छा नहीं है, युवा नही टिकेगा तो चीन उस क्षेत्र में हमला करने का साहस करेगा। डिफेंस की दृष्टि से नवयुवकों का पहाड़ छोड़कर जाना ख़तरनाक हैं। यहाँ की इकॉनमी मनीआर्डर इकॉनमी है,जिसे बदलने की जरूरत है।
पहाड़ का विकास बहुत आसान है। जिसके लिए मेरे दो सूत्र है.. चीड़ को हटाओं.. नीचे बहते पानी को खिंच कर पहाड़ की चोटी तक लाओ। यह युवाओं के लिए चुनौती हैं। यह दुर्भाग्य ही हैं कि आजादी के बाद भी सरकारें उत्तराखंड का लैंड सिस्टम नहीं बदल पायी। आज सरकारों के आदमी देहरादून से ऊपर जाना ही नहीं चाहते। अगर जाएंगे नही तो पहाड़ को कैसे जानेंगे। आज जरूरत है पहाड़ के प्राकतिक सौंदर्य को बहाल किया जाय। सैलानी आये और इस दिव्य निर्माण का सुन्दर एहसास कर सकें।”
10मिनट की बात चित में वे अपने बिगड़े स्वास्थ्य से इतर एक युवा की भांति, जोश और उम्मीद के साथ बोले। जो हर युवा के लिए प्रेरणादायी होगा
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।
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आज 29 जुलाई 2016 को महात्मा गाँधी, श्रीदेव सुमन, पं श्रीराम शर्मा, गौरा देवी जैसे अनेक महापुरुषों को एक शरीर में जीवंत रूप में देखने का सौभाग्य मिला। 89 वर्षीय पर्यावरण गाँधी, पद्म विभूषण श्री सुन्दरलाल बहुगुणा जी ,जो चिपको आंदोलन के सूत्रधार रहे ,के दर्शन का दिव्य अवसर मिला। थोड़ी देर की बात चित में उन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पानी, जवानी और पर्यावरण से सम्बंधित समस्याओं को सूत्र रूप में बताया। अपनी जवानी के दिनों को याद करते हुए उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में मीलो की जागरूकता यात्रा का जिक्र किया। जो आज गांव छोड़ रहे युवाओं को प्रेरणा देने का काम कर सकता हैं।
उनके शब्दों में-“अंग्रेजों ने पैसा कमाने के लिए पहाड़ में चीड़ भर दिए। जिसने मिट्टी को एसिडिक(जहरीली) कर दिया और उसकेे कारण लगातार पहाड़ो में पानी के स्त्रोत सूख रहे है। आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। जीवन जीने का साधन पानी और मिट्टी ख़त्म हो रही है। राज्य में जहाँ घाटियों में थोड़ा समतल ज़मीन थी, वह बाँध बनाकर नष्ट कर दी गयी हैं। इन सब वजहों से यहां का युवा पहाड़ छोड़ के बाहर जा रहा हैं।यह देश के लिए अच्छा नहीं है, युवा नही टिकेगा तो चीन उस क्षेत्र में हमला करने का साहस करेगा। डिफेंस की दृष्टि से नवयुवकों का पहाड़ छोड़कर जाना ख़तरनाक हैं। यहाँ की इकॉनमी मनीआर्डर इकॉनमी है,जिसे बदलने की जरूरत है।
पहाड़ का विकास बहुत आसान है। जिसके लिए मेरे दो सूत्र है.. चीड़ को हटाओं.. नीचे बहते पानी को खिंच कर पहाड़ की चोटी तक लाओ। यह युवाओं के लिए चुनौती हैं। यह दुर्भाग्य ही हैं कि आजादी के बाद भी सरकारें उत्तराखंड का लैंड सिस्टम नहीं बदल पायी। आज सरकारों के आदमी देहरादून से ऊपर जाना ही नहीं चाहते। अगर जाएंगे नही तो पहाड़ को कैसे जानेंगे। आज जरूरत है पहाड़ के प्राकतिक सौंदर्य को बहाल किया जाय। सैलानी आये और इस दिव्य निर्माण का सुन्दर एहसास कर सकें।”
10मिनट की बात चित में वे अपने बिगड़े स्वास्थ्य से इतर एक युवा की भांति, जोश और उम्मीद के साथ बोले। जो हर युवा के लिए प्रेरणादायी होगा


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