अमरीकी विद्वान लेखक डेविड फ्रॅाले के अनुसार पृथ्वी की सबसे पहली ईसा से कम से कम 7000 साल पहले की सभ्यता वैदिक सभ्यता है और यह हिमालय क्षेत्रीय सभ्यता है। जिसमें भारत के 11 राज्य आते हैं, उत्तराखंड जिनमें एक राज्य है।
राज्य आंदोलनकारी त्रेपन सिंह चौहान ने अपनी पुस्तक यमुना में उत्तराखंड राज्य बनने से पूर्व की कहानी को बताते हुए लिखते हैं ‘‘तमाम दुःख उठाकर हम अपने बच्चों को पालते पोसते हैं और वे जब बड़े होते हैं तो हमें छोड़कर नौकरी की तलाश में मैदानों की ओर चले जाते हैं। .........इन पहाड़ों में बहने वाली नदियों का पानी और पहाड़ में पलने वाली जवानी, ये दोनों हमारे किसी काम नहीं आतीं। पहाड़ों का पानी पहाड़ों के कभी काम आया भी, तब, जब पहाड़ों के असहनीय कष्टों से जीने से बेजार होने पर यहां की महिलाओं को निराश होना पड़ा, तो उन्होंने इन नदियों में डूबकर आत्महत्या कर ली।
ये दुःख तब निकला, जब लम्बे समय से यह पहाड़ी क्षेत्र पिछड़ेपन का शिकार हो रहा था। 1993.94 से 1999.2000 के बीच उत्तराखंड क्षेत्र उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, तब इसकी विकास दर 2.9 फीसदी थी जबकि वार्षिक राष्ट्रीय विकास दर 6.6 फीसदी थी। उसी समय पड़ोसी पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की विकास दर 7 फीसदी थी। यह विरोधाभास भी एक अलग पड़ोसी राज्य के लिए आंदोलन का प्रमुख कारण था। संघर्षों और आंदोलनो के बाद, 9 नवंबर 2000 को अपार उम्मीदों और आकाक्षाओं के साथ उत्तर प्रदेश से अलग होकर देश का 27 वां राज्य उत्तराखंड बना। लेकिन स्थिति में कोई खासा बदलाव नहीं आया। राज्य फिर पहाड़ और मैदान में बंट गया। त्रेपन सिंह चौहान अपनी पुस्तक हे ब्वारी में राज्य निर्माण के बाद की कहानी को यमुना की दांसता के रूप में बताते हुए लिखते हैं...कैते है कि यां भौत बिकास हो रा है। देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी में फैकटरी लग री है। हमें लगा चलो राज बनाने में हमारा चाहे कुछ फैदा नी हो रहा। इस प्रदेश में किसी का तो फैदा हो रा है। जिस राज के लिए हमने इतना कुछ बर्बाद किया उसका फायदा हमारे भाई बंधुओं को तो मिलना चाए। इन फैकटरियों से हमको फैदा मिलना तो दूर वो हमारे छोरों का खून चूसने वाली जोक बनकर आए है इस राज में। अपना हाड़-मांस गलाकर हम इन बच्चों को जवानी दे रहे हैं और वे इस जवानी को चूसकर बर्बाद कर रे हैं। ये कथन उस विभाजन को ओर इशारा कर रहा है जो राज्य निर्माण के बाद इन 17 सालों में पैदा हुआ। यहां कुल 13 जिले है, जिसमें 4 मैदानी और 9 पहाड़ी है। कुल क्षेत्रफल का 90 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी है। लगभग 30 लाख से ज्यादा शहरी आबादी है और 70 लाख से ज्यादा ग्रामीण है। यहां कुल आबादी में 30.55 शहर है और 69.45 प्रतिशत गांव है। यह विभाजन पहाड़ के 9 जिलों के साथ मैदान के 4 जिलों के बीच का है, राज्य बनने के बाद प्रति व्यक्ति आय में दस गुना का इजाफा हुआ। राज्य में पर्यटन का विकास हुआ। राज्य ने वृद्धि तो की साथ में असमानता और विस्थापन में भी तेजी आयी।
विस्थापन-
2000 से 2011 के बीच के आंकडों के आधार पर जनसंख्या में वृद्धि असमानता दिखती है। एक ओर जहां चार मैदानी जिलों नैनीताल-25.2, देहरादून-32.48, उधमसिंह नगर-33.4 और हरिद्वार-33.16 प्रतिशत जनंसंख्या की बढ़ोतरी हुई है। वही इन दस सालों में अल्मोड़ा-1.73 और पौढ़ी गढ़वाल -1.51 प्रतिशत जनसंख्या में गिरावट देखी गई। जो लगातार हो रहे विस्थापन की ओर इंगित करता है। विस्तापन के प्रमुख कारणों में बेरोजगारी और शिक्षा के उचित संशाधनों का अभाव है। यहां चार प्रकार के विस्थापन देखने को मिलते है, जिनमें रोजगार के लिए पुरूष का और शादी के कारण महिलाएं का राज्य से बाहर जाती है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग अपने गावों को छोड़कर आसपास के शहरों में आकर रहने लगते है जिसे अंर्तराज्यीय विस्थापन कहा जाता है। साथ ही कुछ लोग एक जिले से दूसरे जिले में कतिपय कारणों से विस्थापित हो जाते है और इनमें से कुछ देश के बाहर शिक्षा दिक्षा के लिए विस्थापन करते है। विस्तापन राज्य की लगातार खतरनाक हो रही समस्या है।
जनसंख्या की असमानता-
राज्य में जनसंख्या की असमान वितरण देखने को मिलता है। एक ओर जहां उत्तरकाशी जिले में कुल राज्य की कुल जनंसंख्या का 3.26 प्रतिशत आबादी निवास करती है और जिले का जनसंख्या धनत्व 41 वर्ग किमी है। वहीं दूसरी ओर राज्य के एक अन्य जिले हरिद्वार की जनंसंख्या 19.05 प्रतिशत है और वहां का जनंसंख्या धनत्व 817 है। ध्यात्वय हो कि उत्तराख्ांड का जनसंख्या धनत्व औसत 189 और देश का औसत धनत्व 382 है। इस प्रकार एक आकड़े के अनुसार 9 पहाड़ी जिलों की जनसंख्या 38.43 प्रतिशत है और 4 मैदानी जिलों की आबादी का प्रतिशत 61.57 है। इस असमान जनसंख्या वितरण को असमान संशाधनों के वितरण के रूप में भी देखा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत आवश्यकताओं की कमी रहती है वही मैदानी जिलों में रोजगार के साधनों के साथ रोड़, स्कूल, चिकित्सालयों की उचित व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त गावों से लगातार लोगों का पलायन हो रहा है। 2001 में 16,826 गांव थे जो 2011 में 16,793 गांव हो गए है और भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
असमान आर्थिक वितरण-
वर्ल्ड बैंक ने डीआईपीपी के साथ मिलकर निकाली व्यापार सुगमता रिर्पोट के आधार पर उत्तराखंड राज्य अपने पिछले स्थान 23 से 9 वे नंबर पर आ गया है। एसोचौम के आर्थिक अनुसंधान ब्यूरो की रिर्पोट में उत्तराखंड एक दशक में उद्योग और सेवा क्षेत्रों में सबसे आगे रहा है। ताजा अध्ययन के अनुसार 2004-05 से 2014-15 में उद्योग क्षेत्र में 16.5 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र में 12.3 प्रतिशत सालान वृद्धि हासिल की है। जो साल प्रतिशत की औसत सालाना वृद्धि के मुकाबले कही आगे है। उत्तराखंड सीएजीआर में शीर्ष पर है। इस अवधि के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में उत्तराखंड का योगदान 0.8 प्रतिशत से बढ़कर 1.2 तक पहुच गया है। इन सब के बावजूद पिछले दस सालों में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। यह 22 प्रतिशत से लुढ़कर 9 प्रतिशत पर पहुंच गया है। राज्य की 75 प्रतिशत से ज्यादा आबादी आज भी कृषि पर निर्भर करती है। उत्तराखंड औषधीय पौधों के मामले में बहुत महत्वपूर्ण है यहां 175 प्रकार की विरल औषधी मिलती है। इसके अतिरिक्त फल, सब्जी और औषधी उत्पादन की दृष्टि से राज्य की भूमि उर्वर है। इन सब के बावजूद यह वानिकी के क्षेत्र में हिमालच और अन्य राज्यों की तुलना में काफी पीछे है।
मैदानी जिले हरिद्वार, नैनीताल, उधमसिंह नगर और देहरादून जिलों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान है। उघोग निदेशक उत्तराखंड के आंकड़े के अनुसार दिसंबर 2012 में 230 उघोग थे जिनमें 274,501.81 करोड़ का निवेश किया गया और जो 85,333 लोगों को रोजगार देती थी। इन उघोगों का उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र तक सिमित होने की वजह से 90 प्रतिशत पहाड़ी भाग पिछड़ता जा रहा है। एक ओर जहां आकड़ों के आधार पर राज्य अव्वल बना है वही दूसरी ओर इन पर गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि यह मात्र चार जिलों के तक सिमित है। राज्य में पर्यटन एक बड़ा आर्थिक माध्यम है। पर्यटन 2013-14 में 20.03 लाख से 2014-15 में 22.09 लाख हो गया है। चार धाम और पहाड़ी क्षेत्रों में धूमने के लिए हर साल सैलानी उत्तराखंड आते है। यह धार्मिक पर्यटन के साथ स्वास्थ्य, साहसिक पर्यटन का मुख्य क्षेत्र रहा है। लेकिन दूर्भाग्य है कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से पर्यटन के लिए सुनियोजित माडॅल नहीं बन पाया है।
उत्तराखंड के बदहाल हालत के कारणों की बात करें तो सबसे पहले राजनैतिक अस्थिरता है। 17 सालों में राज्य त्रिवेन्द्र सिंह रावत 17वे मुख्यमंत्री हैं। जिसमें नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए है। इसके आलावा एक बहुत बड़ा कारण के उत्तर प्रदेश के माडॅल पर पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के विकास करने की बात की जा रही है। भले ही उत्तर प्रदेश से अलग हुए 17 साल हो गए है परंतु आज भी देहरादून में बैठी सरकार वही काम कर रही है जो लखनउ में बैठकर करती थी। 1979 में उत्तर प्रदेश के तत्कालिन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव ने कहा था कि क्या प्रदेश में पहाड़ भी है? इन चितांओं को ध्यान में रखकर ही 2000 में अलग उत्तराखंड राज्य की स्थापना की गई। लेकिन हालत आज भी जस की तस है। 90 प्रतिशत पहाड़ी राज्य की राजधानी देहरादून होना एक और बड़ा बाधक है विकास में। सन् 1984 में जब सबसे पहले अलग उत्तराखंड राज्य की मांग उठी थी तभी से चमोली जिले में स्थित गैरसैण को राजधानी बना दिया गया था। लेकिन आज भी यह मामला राजनितिक घोषणा पत्रों में लटका पड़ा है।
आज पहाड़ी जिलों में लोंगों में निराशा है भय है। निराशा सरकार से और भय प्राकृतिक आपदाओं का । इस वजह से वे अपने घरों को छोड़कर कही भी जाने को मजबूर है। इसके चलते राज्य में भूताहा गावों की संख्या बढ़ती जा रही है। खेत बंजर हो रहे है घर खाली हो रहे है। राजनेताओं के बीच एक और वर्ग है जो ठेकेदार है। चाहे वो भूमाफिया हो, खनन हो, स्कूल, रोड़ के निर्माण की धांधली हो इनके पीछे ये ही गिरोह है। जो राज्य में दीमक की तरह काम कर रहा है। प्राकृतिक संशाधनों से भरापूरा राज्य उत्तराखंड बेहाल हो रहा है तो उसमें राजनेताओं के साथ ठेकेदारों का भी बहुत बड़ा हाथ है।
आज राज्य में सामाजिक एवं सांस्कृतिक बनावट के साथ विकास करने की जरूरत है। साथ ही राज्य की पर्यावरणीय चिंता के साथ विकास के माडॅलों का नियोजन करना चाहिए। फल, सब्जी उत्पादन के साथ सरकार को पर्यटन एवं कुटीर उघोगों को बढ़ावा देकर राज्य में बेरोजगारी की चिंता से लड़ा जा सकता है। इस सब के साथ राज्य में दबाव समूहों, गैर सरकारी संगठनों को भी सामाजिक एवं राजनैतिक चेतना जगाने का काम करना चाहिए।
राज्य आंदोलनकारी त्रेपन सिंह चौहान ने अपनी पुस्तक यमुना में उत्तराखंड राज्य बनने से पूर्व की कहानी को बताते हुए लिखते हैं ‘‘तमाम दुःख उठाकर हम अपने बच्चों को पालते पोसते हैं और वे जब बड़े होते हैं तो हमें छोड़कर नौकरी की तलाश में मैदानों की ओर चले जाते हैं। .........इन पहाड़ों में बहने वाली नदियों का पानी और पहाड़ में पलने वाली जवानी, ये दोनों हमारे किसी काम नहीं आतीं। पहाड़ों का पानी पहाड़ों के कभी काम आया भी, तब, जब पहाड़ों के असहनीय कष्टों से जीने से बेजार होने पर यहां की महिलाओं को निराश होना पड़ा, तो उन्होंने इन नदियों में डूबकर आत्महत्या कर ली।
ये दुःख तब निकला, जब लम्बे समय से यह पहाड़ी क्षेत्र पिछड़ेपन का शिकार हो रहा था। 1993.94 से 1999.2000 के बीच उत्तराखंड क्षेत्र उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, तब इसकी विकास दर 2.9 फीसदी थी जबकि वार्षिक राष्ट्रीय विकास दर 6.6 फीसदी थी। उसी समय पड़ोसी पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की विकास दर 7 फीसदी थी। यह विरोधाभास भी एक अलग पड़ोसी राज्य के लिए आंदोलन का प्रमुख कारण था। संघर्षों और आंदोलनो के बाद, 9 नवंबर 2000 को अपार उम्मीदों और आकाक्षाओं के साथ उत्तर प्रदेश से अलग होकर देश का 27 वां राज्य उत्तराखंड बना। लेकिन स्थिति में कोई खासा बदलाव नहीं आया। राज्य फिर पहाड़ और मैदान में बंट गया। त्रेपन सिंह चौहान अपनी पुस्तक हे ब्वारी में राज्य निर्माण के बाद की कहानी को यमुना की दांसता के रूप में बताते हुए लिखते हैं...कैते है कि यां भौत बिकास हो रा है। देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी में फैकटरी लग री है। हमें लगा चलो राज बनाने में हमारा चाहे कुछ फैदा नी हो रहा। इस प्रदेश में किसी का तो फैदा हो रा है। जिस राज के लिए हमने इतना कुछ बर्बाद किया उसका फायदा हमारे भाई बंधुओं को तो मिलना चाए। इन फैकटरियों से हमको फैदा मिलना तो दूर वो हमारे छोरों का खून चूसने वाली जोक बनकर आए है इस राज में। अपना हाड़-मांस गलाकर हम इन बच्चों को जवानी दे रहे हैं और वे इस जवानी को चूसकर बर्बाद कर रे हैं। ये कथन उस विभाजन को ओर इशारा कर रहा है जो राज्य निर्माण के बाद इन 17 सालों में पैदा हुआ। यहां कुल 13 जिले है, जिसमें 4 मैदानी और 9 पहाड़ी है। कुल क्षेत्रफल का 90 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी है। लगभग 30 लाख से ज्यादा शहरी आबादी है और 70 लाख से ज्यादा ग्रामीण है। यहां कुल आबादी में 30.55 शहर है और 69.45 प्रतिशत गांव है। यह विभाजन पहाड़ के 9 जिलों के साथ मैदान के 4 जिलों के बीच का है, राज्य बनने के बाद प्रति व्यक्ति आय में दस गुना का इजाफा हुआ। राज्य में पर्यटन का विकास हुआ। राज्य ने वृद्धि तो की साथ में असमानता और विस्थापन में भी तेजी आयी।
विस्थापन-
2000 से 2011 के बीच के आंकडों के आधार पर जनसंख्या में वृद्धि असमानता दिखती है। एक ओर जहां चार मैदानी जिलों नैनीताल-25.2, देहरादून-32.48, उधमसिंह नगर-33.4 और हरिद्वार-33.16 प्रतिशत जनंसंख्या की बढ़ोतरी हुई है। वही इन दस सालों में अल्मोड़ा-1.73 और पौढ़ी गढ़वाल -1.51 प्रतिशत जनसंख्या में गिरावट देखी गई। जो लगातार हो रहे विस्थापन की ओर इंगित करता है। विस्तापन के प्रमुख कारणों में बेरोजगारी और शिक्षा के उचित संशाधनों का अभाव है। यहां चार प्रकार के विस्थापन देखने को मिलते है, जिनमें रोजगार के लिए पुरूष का और शादी के कारण महिलाएं का राज्य से बाहर जाती है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग अपने गावों को छोड़कर आसपास के शहरों में आकर रहने लगते है जिसे अंर्तराज्यीय विस्थापन कहा जाता है। साथ ही कुछ लोग एक जिले से दूसरे जिले में कतिपय कारणों से विस्थापित हो जाते है और इनमें से कुछ देश के बाहर शिक्षा दिक्षा के लिए विस्थापन करते है। विस्तापन राज्य की लगातार खतरनाक हो रही समस्या है।
जनसंख्या की असमानता-
राज्य में जनसंख्या की असमान वितरण देखने को मिलता है। एक ओर जहां उत्तरकाशी जिले में कुल राज्य की कुल जनंसंख्या का 3.26 प्रतिशत आबादी निवास करती है और जिले का जनसंख्या धनत्व 41 वर्ग किमी है। वहीं दूसरी ओर राज्य के एक अन्य जिले हरिद्वार की जनंसंख्या 19.05 प्रतिशत है और वहां का जनंसंख्या धनत्व 817 है। ध्यात्वय हो कि उत्तराख्ांड का जनसंख्या धनत्व औसत 189 और देश का औसत धनत्व 382 है। इस प्रकार एक आकड़े के अनुसार 9 पहाड़ी जिलों की जनसंख्या 38.43 प्रतिशत है और 4 मैदानी जिलों की आबादी का प्रतिशत 61.57 है। इस असमान जनसंख्या वितरण को असमान संशाधनों के वितरण के रूप में भी देखा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत आवश्यकताओं की कमी रहती है वही मैदानी जिलों में रोजगार के साधनों के साथ रोड़, स्कूल, चिकित्सालयों की उचित व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त गावों से लगातार लोगों का पलायन हो रहा है। 2001 में 16,826 गांव थे जो 2011 में 16,793 गांव हो गए है और भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
असमान आर्थिक वितरण-
वर्ल्ड बैंक ने डीआईपीपी के साथ मिलकर निकाली व्यापार सुगमता रिर्पोट के आधार पर उत्तराखंड राज्य अपने पिछले स्थान 23 से 9 वे नंबर पर आ गया है। एसोचौम के आर्थिक अनुसंधान ब्यूरो की रिर्पोट में उत्तराखंड एक दशक में उद्योग और सेवा क्षेत्रों में सबसे आगे रहा है। ताजा अध्ययन के अनुसार 2004-05 से 2014-15 में उद्योग क्षेत्र में 16.5 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र में 12.3 प्रतिशत सालान वृद्धि हासिल की है। जो साल प्रतिशत की औसत सालाना वृद्धि के मुकाबले कही आगे है। उत्तराखंड सीएजीआर में शीर्ष पर है। इस अवधि के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में उत्तराखंड का योगदान 0.8 प्रतिशत से बढ़कर 1.2 तक पहुच गया है। इन सब के बावजूद पिछले दस सालों में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। यह 22 प्रतिशत से लुढ़कर 9 प्रतिशत पर पहुंच गया है। राज्य की 75 प्रतिशत से ज्यादा आबादी आज भी कृषि पर निर्भर करती है। उत्तराखंड औषधीय पौधों के मामले में बहुत महत्वपूर्ण है यहां 175 प्रकार की विरल औषधी मिलती है। इसके अतिरिक्त फल, सब्जी और औषधी उत्पादन की दृष्टि से राज्य की भूमि उर्वर है। इन सब के बावजूद यह वानिकी के क्षेत्र में हिमालच और अन्य राज्यों की तुलना में काफी पीछे है।
मैदानी जिले हरिद्वार, नैनीताल, उधमसिंह नगर और देहरादून जिलों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान है। उघोग निदेशक उत्तराखंड के आंकड़े के अनुसार दिसंबर 2012 में 230 उघोग थे जिनमें 274,501.81 करोड़ का निवेश किया गया और जो 85,333 लोगों को रोजगार देती थी। इन उघोगों का उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र तक सिमित होने की वजह से 90 प्रतिशत पहाड़ी भाग पिछड़ता जा रहा है। एक ओर जहां आकड़ों के आधार पर राज्य अव्वल बना है वही दूसरी ओर इन पर गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि यह मात्र चार जिलों के तक सिमित है। राज्य में पर्यटन एक बड़ा आर्थिक माध्यम है। पर्यटन 2013-14 में 20.03 लाख से 2014-15 में 22.09 लाख हो गया है। चार धाम और पहाड़ी क्षेत्रों में धूमने के लिए हर साल सैलानी उत्तराखंड आते है। यह धार्मिक पर्यटन के साथ स्वास्थ्य, साहसिक पर्यटन का मुख्य क्षेत्र रहा है। लेकिन दूर्भाग्य है कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से पर्यटन के लिए सुनियोजित माडॅल नहीं बन पाया है।
उत्तराखंड के बदहाल हालत के कारणों की बात करें तो सबसे पहले राजनैतिक अस्थिरता है। 17 सालों में राज्य त्रिवेन्द्र सिंह रावत 17वे मुख्यमंत्री हैं। जिसमें नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए है। इसके आलावा एक बहुत बड़ा कारण के उत्तर प्रदेश के माडॅल पर पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के विकास करने की बात की जा रही है। भले ही उत्तर प्रदेश से अलग हुए 17 साल हो गए है परंतु आज भी देहरादून में बैठी सरकार वही काम कर रही है जो लखनउ में बैठकर करती थी। 1979 में उत्तर प्रदेश के तत्कालिन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव ने कहा था कि क्या प्रदेश में पहाड़ भी है? इन चितांओं को ध्यान में रखकर ही 2000 में अलग उत्तराखंड राज्य की स्थापना की गई। लेकिन हालत आज भी जस की तस है। 90 प्रतिशत पहाड़ी राज्य की राजधानी देहरादून होना एक और बड़ा बाधक है विकास में। सन् 1984 में जब सबसे पहले अलग उत्तराखंड राज्य की मांग उठी थी तभी से चमोली जिले में स्थित गैरसैण को राजधानी बना दिया गया था। लेकिन आज भी यह मामला राजनितिक घोषणा पत्रों में लटका पड़ा है।
आज पहाड़ी जिलों में लोंगों में निराशा है भय है। निराशा सरकार से और भय प्राकृतिक आपदाओं का । इस वजह से वे अपने घरों को छोड़कर कही भी जाने को मजबूर है। इसके चलते राज्य में भूताहा गावों की संख्या बढ़ती जा रही है। खेत बंजर हो रहे है घर खाली हो रहे है। राजनेताओं के बीच एक और वर्ग है जो ठेकेदार है। चाहे वो भूमाफिया हो, खनन हो, स्कूल, रोड़ के निर्माण की धांधली हो इनके पीछे ये ही गिरोह है। जो राज्य में दीमक की तरह काम कर रहा है। प्राकृतिक संशाधनों से भरापूरा राज्य उत्तराखंड बेहाल हो रहा है तो उसमें राजनेताओं के साथ ठेकेदारों का भी बहुत बड़ा हाथ है।
आज राज्य में सामाजिक एवं सांस्कृतिक बनावट के साथ विकास करने की जरूरत है। साथ ही राज्य की पर्यावरणीय चिंता के साथ विकास के माडॅलों का नियोजन करना चाहिए। फल, सब्जी उत्पादन के साथ सरकार को पर्यटन एवं कुटीर उघोगों को बढ़ावा देकर राज्य में बेरोजगारी की चिंता से लड़ा जा सकता है। इस सब के साथ राज्य में दबाव समूहों, गैर सरकारी संगठनों को भी सामाजिक एवं राजनैतिक चेतना जगाने का काम करना चाहिए।
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