मेरे गाँव के लोग इस बार गेहूं नहीं लगाने वाले हैं। सही भी हैं, क्योंकि इससे पहले वे लोग घान की फसल, बारिश के नहीं औऱ सही समय पर नहीं होने की वजह से ख़राब कर चुके हैं। यही कारण था कि इस साल असोज में खेतों का दृश्य डरावना था। चारों ओर बस घास ही घास। जिन खेतों में मैंने कुछ साल पहले घान, गेहूं, मडुवा आदि फसलों को लगा देखा, वहाँ आज बस घास का जंगल हैं। यहाँ लोग असोज में सुबह-सुबह निकल पड़ते ओर देर शाम तक घास ही काटते रहते। खुशी-खूशी वे लोग घास काट रहे हैं। लुटे लगा रहे हैं। दिन-रात एक कर रहे हैं। अपने खेतों में घास के जंगल को देखकर वे कितने खुश हैं/या कितने कम दुःखी हैं। सवाल हैं/ सोचने का विषय हैं? पिछले कुछ सालों से उत्तराखंड के पहाड़ी राज्यों में खेती कम होती जा रही है और बंजर खेत बढ़ते जा रहे हैं। कुछ छोटे मोटे प्रयोग जिन्होंने फल,सब्जी पे काम किया है उन्हें छोड़ कर बाक़ी सब बंजर-वीरान हैं। लोग खेतों को घास के लिए उपयोग कर रहे हैं। खेती कम करके गाय और भैंस पालने पे ध्यान दे रहे हैं। ठीक भी हैं। खेती में एक ओर मौसम की मार हैं दूसरी ओर जानवरों(बंदर, जंगली सुवर) का आतंक। अगर इन से बचकर फसल भी हों जाए तो मार्केटिंग जीरो हैं। कुछ ऐसा ही फल-सब्जी के पैदावार करने वालों के साथ भी हैं। मोदी जी केदारनाथ में उत्तराखंड को आर्गेनिक स्टेट बनाने की बात कर रहे हैं लेकिन मजे की बात ये है कि कि उत्तराखंड नैचुरली आर्गेनिक स्टेट है। ज़रूरत है उसके लिए सिस्टम बनाने की। मार्केटिंग का सिस्टम बनाने की। आजकल देहरादून में 2% कृषि लोन की चर्चा चल रही हैं। लेकिन किसान खेती ही नहीं करेगा तो लोन कैसा? पिछले साल दौलाघट में एक गोदाम में महंगी आर्गेनिक खाद रखी रही, जिसे सरकार फ्री में बाट रही थी। जो इक-आद लोग ले भी गए, उन्हें कोई प्रयोग के तरीके समझाने वाला नहीं था। ऐसे ही एक बार किसानों के लिए जिंक आया, जो खेत मे नमी कम करने का काम करता हैं, लेकिन फिर कोई बताने वाला नहीं था तो लोगों ने सूखे खेतों में डाल दिया और फसल खराब हो गई। बीज लगाने के बाद ऐसा हर बार होता कि बीज ख़राब हो जाता हैं। इसके दो कारण हैं एक पहाड़ी भूगोल आधारित बीज की अनुपलब्धता ओर दूसरा कृषि अधिकारियों का पहाड़ का न होना। जिस कारण वे यहां की परिस्थितियों को नहीं समझ पाते हैं। एक किसान के जीवन मे आज बहुत संघर्ष हैं सरकार जिसे बिना समझे कम करने की सोच रही हैं। आप किसानों की आय दोगुना करने की बात कर रहे हैं, यहाँ किसान ही नहीं बचे तो क्या होगा?
सुझाव-
1-उत्तराखंड में किसानी में बड़े बदलाव की जरूरत हैं, जिसमें एग्रिकल्चर से हार्डीकल्चर में शिफ़्ट होने की आवश्यकता है।
2- लोकल औऱ आउट ऑफ स्टेट मार्केटिंग पर विशेष ध्यान देना हैं।
3-किसानी मजबूरी नहीं फायदे का सौदा बनें।
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