नैनीताल जिले के रामगढ़ ब्लाक में स्थित है कुलगाड़ गांव। स्थानीय निवासियों की माने तोए पहाड़ी गधेरे के किराने छोटे.छोटे खेतों के बीच बसे होने के कारण गांव का नाम कुलगाड़ पड़ा। यह गांव छोटा हैए जैसे कि लगभग 80 फीसदी उत्तराखंड के गावं हैए जहां केवल 23 परिवार रहते है। हल्द्वानी से अल्मोड़ा जाने वाले नेशनल हाइवे नंबर 87 से कुलगाड़ गांव दिखता तो पास में है लेकिन कुछ दूर टेडे.मेडे रास्ते से पैदल चलकर यहां पहुंचा जा सकता है। कुल साल पहले गांव के निवासी शहीद मेजर मनोज भंडारी को श्रद्धांजली देते हुए गांव में सड़क पहंुच पायी हैए जो अभी कच्ची है। स्थानीय बाजारए सुयालबाड़ी स्थित सड़क से गांव स्पष्ट दिखायी देता है। जहां छोटे.छोटे सीढ़ीनुमा खेतों से उपर की ओर बसे गांव को देखकर पहाड़ी गांवों को बेहतर समझा जा सकता है।
जल समिति
कुलगाड़ा गांव की सबसे खास बात हैए यहां की जल समिति एवं सरस्वती स्वयं सहायता समूह। जो महिला नेतृत्व आधारित हैए प्रत्येक में 9.9 सदस्य है जिसमें 5 महिलाएं और 4 पुरूष हैं। जल समिति मूलरूप से गांव में पानी के जुड़े मुद्दों को लेकर चिराग संस्था के सहयोग से बनायी गई। जो 2013 से इस गांव में प्राकृतिक जल स्त्रोतों के लेकर काम कर रही है। कुलगाड़ गांव की जलसमिति की अध्यक्ष सविता भण्डारी कहती है कि हमारे गांव में समिति 2013 से शुरू हुई और 2014 में काम शुरू किया। जिसमें पांच महिलाओं के साथ चार पुरूष भी हैं। सभी ने मिलकर नौले का जीर्णोधार का काम किया है। जलग्रहण क्षेत्र में भी काम हुआ हंै। जल समिति का अपना आर्थिक माॅडल भी है। समिति की कोषाध्यक्ष कंुती देवी के अनुसार हम सभी सदस्यगण सरस्वती स्वयं सहायता समूह में 50 और जल समीति में 10 रूप्ए प्रतिमाह जमा करते हैं। इसमें कुल 9 लोग होते है। एक और व्यक्ति बाहर से जुड़ जाता हैए इस प्रकार कुल 10 लोग द्वारा प्रतिमाह 100 रूप्ए जमा किए जाते हैं। इस जमा धन का उपयोग खालए गड्डों की सफाईए नौले की सफाई आदि कार्यों के लिए किया जाता है। समिति में पैसा जमा करने का एक ही उद्देश्य होता है ताकि वो पानी के काम को अपना समझ के करें। इस प्रकार जल समिति ग्रामीणों के बीच आपसी संचार का माध्यम बना है जिसकी सहायता से सामुदायिक कार्यों को संस्था द्वारा अंजाम दिया जाता रहा है।
विकास का चिराग
चिराग संस्था मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पिछले लगभग 30 सालों से ग्रामीणों के बीच काम कर रहा है जिसका मुख्य लक्ष्य शिक्षाए स्वास्थ्यए आजीविका और पेयजल विषयों को लेकर समुदाय को जागरूक किया जाएए उनका विकास किया जाए। इसी संस्था के माग्रदर्शन में कुलगांड़ के प्राकृतिक जल स्त्रोतों को पुर्नजीवित करने का काम हुआ हैं। जिसकी सबसे विशेषता इसका पूर्णतः समुदाय आधारित एवं महिला नेतृत्व प्रधान होना है। ग्रामीण जल स्त्रोतोंए जिसे स्थानीय भाषा में नौलाए धारा एवं पनेरा कहां जाता हैए के रिचार्ज पर काम किया गया है। यह प्रयास जितना वैज्ञानिक है उनका ही इसमें परंपरागत तकनीकों का प्रभाव हैए शायद यही वजह थी कि यह सफल भी रहा। चिराग संस्था में डेवलेपमेन्ट एसिसटेंट पद पर कार्यरत कृष्ण चंद भंडारी नौले को समझाते हुए कहते है कि आसपास के पानी को एक स्थान पर एकत्रित करने के लिए नाले का निर्माण किया जाता है। हमारे बुर्जगों ने स्थानीय पत्थरोंए मिटृी की मदद से पानी के स्त्रोतों को नौले का रूप दिया। किन्ही स्थानों पर मांस की दाल को पीसकर या फिर लाल मिटृी के माध्यम से नौले का निर्माण किया गया। स्थानीय दास्तकारों द्वारा नौले की आंतरिक बनाबट में सीढ़ी इसलिए बनायी गई ताकि पानी का तल बाहर की ओर न भागे एवं नौले के अंदर स्वच्छता भी बने रहे। कुलगाड़ के पनेरा नौले के उन्नयन के लिए 2013 से अरग्यम की मदद से चिराग द्वारा तकनीकी सहयोग एवं भूगर्भीय सर्वेक्षण के लिए एक्वाडेम पुणे ने सहायता दी। आज पांच साल बाद इसमें गर्मीयों के सीजन में 5 से 6 लीटर पानी एवं बरसात में 15 लीटर पानी रहता हैएजो गांव वालों के लिए पर्याप्त होता है।
पनेरा नौला
गांव के उत्तर मंे एक नौला हैए जिसे गाववासी पनेरा नौला कहते है। यह पानी के स्त्रोत के साथ ग्रामीणों के लिए परंपरा एवं संस्कृति का केन्द्र है। यहां के निवासियों की मान्यता है कि नौले के जल मे विष्णु का निवास स्थान होता है। शादी के बाद दुल्हा और दुल्हन नौले में जाते है और अपना मुकुट वहां स्थापित करके आते है। दुल्हन नौले के पानी को भरकर सभी परिवारवालों को पिलाती है। और जब भी गांव में कोई कथाए शीर्वाचन होता है उसकी सामाग्री का विषर्जन भी वही होता है। लेकिन जो आज से पांच वर्ष पूर्व सूखता जा रहा था। स्थानीय वरिष्ठ नागरिक श्री शेर सिंह भंडारी कहते है कि उन्होनें अपने जीवन के 95 साल में कभी नौले को सूखते हुए नहीं देखाए हां! ये जब से गांव में पाइप लाइन आयी है यह गर्मी के दिनों में सूख जाता है। शेर सिंह जी की ये बाते जल संस्थान द्वारा लगाई गयीं पाइप लाइनों की ओर इशारा कर रही है जो पहाड़ी गांवों में पेयजल मुहैया कराने के लिए किए गए अदूरदर्शी सोच है। पाइप लाइनें से किसी न किसी जल स्त्रोत के माध्यम से ही पानी आता हैए हर ग्राम प्रधान जब भी पानी के संकट की बात आती है तो पाइप लाइन तो लगवा देता है लेकिन जल स्त्रातों के जलस्तर को बढ़ाने की कोई नहीं सोचता है। हालांकि शुरूआत में कुल दिन पाइपों में पानी रहता है लेकिन गर्मी आने के साथ ही ये भी सूख जाते है। इसी संदर्भ में स्थानीय विशेषज्ञ कहते है कि अगर उत्तराखंड राज्य में पानी की आपूर्ति के लिए लगाए गई सभी पाइप लाइनों को आपस में जोड़कर चंाद तक पहुंचा जा सकता सकता है। इस बयान में सत्यता हो न हो लेकिन सवाल जरूर है।
सामुदायिक प्रयास
यह प्राकृतिक संशाधनों का उपभोग नहीं उपयोग करना चाहिए यह प्रकृति का साष्वत नियम हैए जिसे आज का मनुष्य नहीं समझ पा रहा है। कुलगाड़ जल समिति की संदर्भ व्यक्ति एवं पैराहाइड्रोसाइटिस्ट प्रेमा भंडारी कहती हैं कि हमारे गांव का नौला जो कुछ समय पहले सूख गया था उसके संवर्धन के लिए जल समिति ने काम किया है। एक समय नौले का डिस्चार्ज केवल 4 एलपीएम यानी लीटर प्रति मिनट रह गया था। जिसके लिए हमने सामुदायिक प्रयासों से उसके कैचमेन्ट के 7ण्3 हेक्टेयर में काम किया। जिसमें लगभग दो बार में छह हजार से ज्यादा पौधों की बुआई की थी। इसके अतिरिक्त कैचमेन्ट में कंटूर टैंकए खालए चैकडैमए परकूलेसन पीड बनाए गए। ये सभी कार्य समीति के माध्यम से ग्रामीणों के सहयोग से किया गया। यह काम इतना आसान नहीं था इसमें एक विवाद सामने आया जिसमें गांव के गधेरे के बीच स्थित नौले के कैचमेंट को लेकर आया। नौला कुलागाड़ गांव की जमीन में है। लेकिन इसका कैचमेन्ट एरिया दूसरे गांव की जमीन में है। आपस में चार.पांच महीने की मीटिंग के बाद उन्हंे हम ये बता पाए की स्त्रोत कितना जरूरी है। उनको भी लगा ये सही काम कर रहे है।
कुलगाड़ कैचमेन्ट एरिया में दो प्रकार के पत्थर है। एक है क्वाडजाईट और दूसरा फलाईट एवं यहां पत्थरों का उत्तरी पूर्वी ढलान है। क्वाटजाईटए यह कठोर होता है जो पानी को रोकता है। इसे स्थानीय भाषा में डासी पत्थर बोलते है। दूसरा फलाईट जिसमें अलग अलग परतें होती हैं। यह अपनी परतों में पानी को रोक के रखता है और धीरे धीरे छोड़ता है। फलाईट में फैक्चर यानी दरारें है जिसके द्वारा पानी धीरे.धीरे नौले की ओर जाता है। पहले हमारे नौले में 4 एलपीएम पानी था अब 14 एलपीएम रहता है। इसके साथ प्रतिमाह पानी को नापतें है और जांच करते है। इसके अम्लीयता और छारीयता की जांच करते है। चिराग संस्था के एरिया मैनेजर भीम सिंह नेगी कहते है कि समुदाय के माध्यम से इस कुलगाड़ के कैचमेन्ट एरिया में 2013.15 के बीच हमने खाल.चालए कंटूर ट्रन्चए वृक्षारोपण का काम किया है। जिसके काफी अच्छे परिणाम आए। ग्रामवासी गर्मी के मौसम मेें आग बुझाने के लिए अपने प्रयास भी करते रहते है। आज ग्रामीण पानीए जंगल को लेकर जागरूक हैं यही हमारे काम की सफलता है।
नैनीताल जिले के रामगढ़ ब्लाक में स्थित है कुलगाड़ गांव। स्थानीय निवासियों की माने तोए पहाड़ी गधेरे के किराने छोटे.छोटे खेतों के बीच बसे होने के कारण गांव का नाम कुलगाड़ पड़ा। यह गांव छोटा हैए जैसे कि लगभग 80 फीसदी उत्तराखंड के गावं हैए जहां केवल 23 परिवार रहते है। हल्द्वानी से अल्मोड़ा जाने वाले नेशनल हाइवे नंबर 87 से कुलगाड़ गांव दिखता तो पास में है लेकिन कुछ दूर टेडे.मेडे रास्ते से पैदल चलकर यहां पहुंचा जा सकता है। कुल साल पहले गांव के निवासी शहीद मेजर मनोज भंडारी को श्रद्धांजली देते हुए गांव में सड़क पहंुच पायी हैए जो अभी कच्ची है। स्थानीय बाजारए सुयालबाड़ी स्थित सड़क से गांव स्पष्ट दिखायी देता है। जहां छोटे.छोटे सीढ़ीनुमा खेतों से उपर की ओर बसे गांव को देखकर पहाड़ी गांवों को बेहतर समझा जा सकता है।
जल समिति
कुलगाड़ा गांव की सबसे खास बात हैए यहां की जल समिति एवं सरस्वती स्वयं सहायता समूह। जो महिला नेतृत्व आधारित हैए प्रत्येक में 9.9 सदस्य है जिसमें 5 महिलाएं और 4 पुरूष हैं। जल समिति मूलरूप से गांव में पानी के जुड़े मुद्दों को लेकर चिराग संस्था के सहयोग से बनायी गई। जो 2013 से इस गांव में प्राकृतिक जल स्त्रोतों के लेकर काम कर रही है। कुलगाड़ गांव की जलसमिति की अध्यक्ष सविता भण्डारी कहती है कि हमारे गांव में समिति 2013 से शुरू हुई और 2014 में काम शुरू किया। जिसमें पांच महिलाओं के साथ चार पुरूष भी हैं। सभी ने मिलकर नौले का जीर्णोधार का काम किया है। जलग्रहण क्षेत्र में भी काम हुआ हंै। जल समिति का अपना आर्थिक माॅडल भी है। समिति की कोषाध्यक्ष कंुती देवी के अनुसार हम सभी सदस्यगण सरस्वती स्वयं सहायता समूह में 50 और जल समीति में 10 रूप्ए प्रतिमाह जमा करते हैं। इसमें कुल 9 लोग होते है। एक और व्यक्ति बाहर से जुड़ जाता हैए इस प्रकार कुल 10 लोग द्वारा प्रतिमाह 100 रूप्ए जमा किए जाते हैं। इस जमा धन का उपयोग खालए गड्डों की सफाईए नौले की सफाई आदि कार्यों के लिए किया जाता है। समिति में पैसा जमा करने का एक ही उद्देश्य होता है ताकि वो पानी के काम को अपना समझ के करें। इस प्रकार जल समिति ग्रामीणों के बीच आपसी संचार का माध्यम बना है जिसकी सहायता से सामुदायिक कार्यों को संस्था द्वारा अंजाम दिया जाता रहा है।
विकास का चिराग
चिराग संस्था मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पिछले लगभग 30 सालों से ग्रामीणों के बीच काम कर रहा है जिसका मुख्य लक्ष्य शिक्षाए स्वास्थ्यए आजीविका और पेयजल विषयों को लेकर समुदाय को जागरूक किया जाएए उनका विकास किया जाए। इसी संस्था के माग्रदर्शन में कुलगांड़ के प्राकृतिक जल स्त्रोतों को पुर्नजीवित करने का काम हुआ हैं। जिसकी सबसे विशेषता इसका पूर्णतः समुदाय आधारित एवं महिला नेतृत्व प्रधान होना है। ग्रामीण जल स्त्रोतोंए जिसे स्थानीय भाषा में नौलाए धारा एवं पनेरा कहां जाता हैए के रिचार्ज पर काम किया गया है। यह प्रयास जितना वैज्ञानिक है उनका ही इसमें परंपरागत तकनीकों का प्रभाव हैए शायद यही वजह थी कि यह सफल भी रहा। चिराग संस्था में डेवलेपमेन्ट एसिसटेंट पद पर कार्यरत कृष्ण चंद भंडारी नौले को समझाते हुए कहते है कि आसपास के पानी को एक स्थान पर एकत्रित करने के लिए नाले का निर्माण किया जाता है। हमारे बुर्जगों ने स्थानीय पत्थरोंए मिटृी की मदद से पानी के स्त्रोतों को नौले का रूप दिया। किन्ही स्थानों पर मांस की दाल को पीसकर या फिर लाल मिटृी के माध्यम से नौले का निर्माण किया गया। स्थानीय दास्तकारों द्वारा नौले की आंतरिक बनाबट में सीढ़ी इसलिए बनायी गई ताकि पानी का तल बाहर की ओर न भागे एवं नौले के अंदर स्वच्छता भी बने रहे। कुलगाड़ के पनेरा नौले के उन्नयन के लिए 2013 से अरग्यम की मदद से चिराग द्वारा तकनीकी सहयोग एवं भूगर्भीय सर्वेक्षण के लिए एक्वाडेम पुणे ने सहायता दी। आज पांच साल बाद इसमें गर्मीयों के सीजन में 5 से 6 लीटर पानी एवं बरसात में 15 लीटर पानी रहता हैएजो गांव वालों के लिए पर्याप्त होता है।
पनेरा नौला
गांव के उत्तर मंे एक नौला हैए जिसे गाववासी पनेरा नौला कहते है। यह पानी के स्त्रोत के साथ ग्रामीणों के लिए परंपरा एवं संस्कृति का केन्द्र है। यहां के निवासियों की मान्यता है कि नौले के जल मे विष्णु का निवास स्थान होता है। शादी के बाद दुल्हा और दुल्हन नौले में जाते है और अपना मुकुट वहां स्थापित करके आते है। दुल्हन नौले के पानी को भरकर सभी परिवारवालों को पिलाती है। और जब भी गांव में कोई कथाए शीर्वाचन होता है उसकी सामाग्री का विषर्जन भी वही होता है। लेकिन जो आज से पांच वर्ष पूर्व सूखता जा रहा था। स्थानीय वरिष्ठ नागरिक श्री शेर सिंह भंडारी कहते है कि उन्होनें अपने जीवन के 95 साल में कभी नौले को सूखते हुए नहीं देखाए हां! ये जब से गांव में पाइप लाइन आयी है यह गर्मी के दिनों में सूख जाता है। शेर सिंह जी की ये बाते जल संस्थान द्वारा लगाई गयीं पाइप लाइनों की ओर इशारा कर रही है जो पहाड़ी गांवों में पेयजल मुहैया कराने के लिए किए गए अदूरदर्शी सोच है। पाइप लाइनें से किसी न किसी जल स्त्रोत के माध्यम से ही पानी आता हैए हर ग्राम प्रधान जब भी पानी के संकट की बात आती है तो पाइप लाइन तो लगवा देता है लेकिन जल स्त्रातों के जलस्तर को बढ़ाने की कोई नहीं सोचता है। हालांकि शुरूआत में कुल दिन पाइपों में पानी रहता है लेकिन गर्मी आने के साथ ही ये भी सूख जाते है। इसी संदर्भ में स्थानीय विशेषज्ञ कहते है कि अगर उत्तराखंड राज्य में पानी की आपूर्ति के लिए लगाए गई सभी पाइप लाइनों को आपस में जोड़कर चंाद तक पहुंचा जा सकता सकता है। इस बयान में सत्यता हो न हो लेकिन सवाल जरूर है।
सामुदायिक प्रयास
यह प्राकृतिक संशाधनों का उपभोग नहीं उपयोग करना चाहिए यह प्रकृति का साष्वत नियम हैए जिसे आज का मनुष्य नहीं समझ पा रहा है। कुलगाड़ जल समिति की संदर्भ व्यक्ति एवं पैराहाइड्रोसाइटिस्ट प्रेमा भंडारी कहती हैं कि हमारे गांव का नौला जो कुछ समय पहले सूख गया था उसके संवर्धन के लिए जल समिति ने काम किया है। एक समय नौले का डिस्चार्ज केवल 4 एलपीएम यानी लीटर प्रति मिनट रह गया था। जिसके लिए हमने सामुदायिक प्रयासों से उसके कैचमेन्ट के 7ण्3 हेक्टेयर में काम किया। जिसमें लगभग दो बार में छह हजार से ज्यादा पौधों की बुआई की थी। इसके अतिरिक्त कैचमेन्ट में कंटूर टैंकए खालए चैकडैमए परकूलेसन पीड बनाए गए। ये सभी कार्य समीति के माध्यम से ग्रामीणों के सहयोग से किया गया। यह काम इतना आसान नहीं था इसमें एक विवाद सामने आया जिसमें गांव के गधेरे के बीच स्थित नौले के कैचमेंट को लेकर आया। नौला कुलागाड़ गांव की जमीन में है। लेकिन इसका कैचमेन्ट एरिया दूसरे गांव की जमीन में है। आपस में चार.पांच महीने की मीटिंग के बाद उन्हंे हम ये बता पाए की स्त्रोत कितना जरूरी है। उनको भी लगा ये सही काम कर रहे है।
कुलगाड़ कैचमेन्ट एरिया में दो प्रकार के पत्थर है। एक है क्वाडजाईट और दूसरा फलाईट एवं यहां पत्थरों का उत्तरी पूर्वी ढलान है। क्वाटजाईटए यह कठोर होता है जो पानी को रोकता है। इसे स्थानीय भाषा में डासी पत्थर बोलते है। दूसरा फलाईट जिसमें अलग अलग परतें होती हैं। यह अपनी परतों में पानी को रोक के रखता है और धीरे धीरे छोड़ता है। फलाईट में फैक्चर यानी दरारें है जिसके द्वारा पानी धीरे.धीरे नौले की ओर जाता है। पहले हमारे नौले में 4 एलपीएम पानी था अब 14 एलपीएम रहता है। इसके साथ प्रतिमाह पानी को नापतें है और जांच करते है। इसके अम्लीयता और छारीयता की जांच करते है। चिराग संस्था के एरिया मैनेजर भीम सिंह नेगी कहते है कि समुदाय के माध्यम से इस कुलगाड़ के कैचमेन्ट एरिया में 2013.15 के बीच हमने खाल.चालए कंटूर ट्रन्चए वृक्षारोपण का काम किया है। जिसके काफी अच्छे परिणाम आए। ग्रामवासी गर्मी के मौसम मेें आग बुझाने के लिए अपने प्रयास भी करते रहते है। आज ग्रामीण पानीए जंगल को लेकर जागरूक हैं यही हमारे काम की सफलता है।
जल समिति
कुलगाड़ा गांव की सबसे खास बात हैए यहां की जल समिति एवं सरस्वती स्वयं सहायता समूह। जो महिला नेतृत्व आधारित हैए प्रत्येक में 9.9 सदस्य है जिसमें 5 महिलाएं और 4 पुरूष हैं। जल समिति मूलरूप से गांव में पानी के जुड़े मुद्दों को लेकर चिराग संस्था के सहयोग से बनायी गई। जो 2013 से इस गांव में प्राकृतिक जल स्त्रोतों के लेकर काम कर रही है। कुलगाड़ गांव की जलसमिति की अध्यक्ष सविता भण्डारी कहती है कि हमारे गांव में समिति 2013 से शुरू हुई और 2014 में काम शुरू किया। जिसमें पांच महिलाओं के साथ चार पुरूष भी हैं। सभी ने मिलकर नौले का जीर्णोधार का काम किया है। जलग्रहण क्षेत्र में भी काम हुआ हंै। जल समिति का अपना आर्थिक माॅडल भी है। समिति की कोषाध्यक्ष कंुती देवी के अनुसार हम सभी सदस्यगण सरस्वती स्वयं सहायता समूह में 50 और जल समीति में 10 रूप्ए प्रतिमाह जमा करते हैं। इसमें कुल 9 लोग होते है। एक और व्यक्ति बाहर से जुड़ जाता हैए इस प्रकार कुल 10 लोग द्वारा प्रतिमाह 100 रूप्ए जमा किए जाते हैं। इस जमा धन का उपयोग खालए गड्डों की सफाईए नौले की सफाई आदि कार्यों के लिए किया जाता है। समिति में पैसा जमा करने का एक ही उद्देश्य होता है ताकि वो पानी के काम को अपना समझ के करें। इस प्रकार जल समिति ग्रामीणों के बीच आपसी संचार का माध्यम बना है जिसकी सहायता से सामुदायिक कार्यों को संस्था द्वारा अंजाम दिया जाता रहा है।
विकास का चिराग
चिराग संस्था मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पिछले लगभग 30 सालों से ग्रामीणों के बीच काम कर रहा है जिसका मुख्य लक्ष्य शिक्षाए स्वास्थ्यए आजीविका और पेयजल विषयों को लेकर समुदाय को जागरूक किया जाएए उनका विकास किया जाए। इसी संस्था के माग्रदर्शन में कुलगांड़ के प्राकृतिक जल स्त्रोतों को पुर्नजीवित करने का काम हुआ हैं। जिसकी सबसे विशेषता इसका पूर्णतः समुदाय आधारित एवं महिला नेतृत्व प्रधान होना है। ग्रामीण जल स्त्रोतोंए जिसे स्थानीय भाषा में नौलाए धारा एवं पनेरा कहां जाता हैए के रिचार्ज पर काम किया गया है। यह प्रयास जितना वैज्ञानिक है उनका ही इसमें परंपरागत तकनीकों का प्रभाव हैए शायद यही वजह थी कि यह सफल भी रहा। चिराग संस्था में डेवलेपमेन्ट एसिसटेंट पद पर कार्यरत कृष्ण चंद भंडारी नौले को समझाते हुए कहते है कि आसपास के पानी को एक स्थान पर एकत्रित करने के लिए नाले का निर्माण किया जाता है। हमारे बुर्जगों ने स्थानीय पत्थरोंए मिटृी की मदद से पानी के स्त्रोतों को नौले का रूप दिया। किन्ही स्थानों पर मांस की दाल को पीसकर या फिर लाल मिटृी के माध्यम से नौले का निर्माण किया गया। स्थानीय दास्तकारों द्वारा नौले की आंतरिक बनाबट में सीढ़ी इसलिए बनायी गई ताकि पानी का तल बाहर की ओर न भागे एवं नौले के अंदर स्वच्छता भी बने रहे। कुलगाड़ के पनेरा नौले के उन्नयन के लिए 2013 से अरग्यम की मदद से चिराग द्वारा तकनीकी सहयोग एवं भूगर्भीय सर्वेक्षण के लिए एक्वाडेम पुणे ने सहायता दी। आज पांच साल बाद इसमें गर्मीयों के सीजन में 5 से 6 लीटर पानी एवं बरसात में 15 लीटर पानी रहता हैएजो गांव वालों के लिए पर्याप्त होता है।
पनेरा नौला
गांव के उत्तर मंे एक नौला हैए जिसे गाववासी पनेरा नौला कहते है। यह पानी के स्त्रोत के साथ ग्रामीणों के लिए परंपरा एवं संस्कृति का केन्द्र है। यहां के निवासियों की मान्यता है कि नौले के जल मे विष्णु का निवास स्थान होता है। शादी के बाद दुल्हा और दुल्हन नौले में जाते है और अपना मुकुट वहां स्थापित करके आते है। दुल्हन नौले के पानी को भरकर सभी परिवारवालों को पिलाती है। और जब भी गांव में कोई कथाए शीर्वाचन होता है उसकी सामाग्री का विषर्जन भी वही होता है। लेकिन जो आज से पांच वर्ष पूर्व सूखता जा रहा था। स्थानीय वरिष्ठ नागरिक श्री शेर सिंह भंडारी कहते है कि उन्होनें अपने जीवन के 95 साल में कभी नौले को सूखते हुए नहीं देखाए हां! ये जब से गांव में पाइप लाइन आयी है यह गर्मी के दिनों में सूख जाता है। शेर सिंह जी की ये बाते जल संस्थान द्वारा लगाई गयीं पाइप लाइनों की ओर इशारा कर रही है जो पहाड़ी गांवों में पेयजल मुहैया कराने के लिए किए गए अदूरदर्शी सोच है। पाइप लाइनें से किसी न किसी जल स्त्रोत के माध्यम से ही पानी आता हैए हर ग्राम प्रधान जब भी पानी के संकट की बात आती है तो पाइप लाइन तो लगवा देता है लेकिन जल स्त्रातों के जलस्तर को बढ़ाने की कोई नहीं सोचता है। हालांकि शुरूआत में कुल दिन पाइपों में पानी रहता है लेकिन गर्मी आने के साथ ही ये भी सूख जाते है। इसी संदर्भ में स्थानीय विशेषज्ञ कहते है कि अगर उत्तराखंड राज्य में पानी की आपूर्ति के लिए लगाए गई सभी पाइप लाइनों को आपस में जोड़कर चंाद तक पहुंचा जा सकता सकता है। इस बयान में सत्यता हो न हो लेकिन सवाल जरूर है।
सामुदायिक प्रयास
यह प्राकृतिक संशाधनों का उपभोग नहीं उपयोग करना चाहिए यह प्रकृति का साष्वत नियम हैए जिसे आज का मनुष्य नहीं समझ पा रहा है। कुलगाड़ जल समिति की संदर्भ व्यक्ति एवं पैराहाइड्रोसाइटिस्ट प्रेमा भंडारी कहती हैं कि हमारे गांव का नौला जो कुछ समय पहले सूख गया था उसके संवर्धन के लिए जल समिति ने काम किया है। एक समय नौले का डिस्चार्ज केवल 4 एलपीएम यानी लीटर प्रति मिनट रह गया था। जिसके लिए हमने सामुदायिक प्रयासों से उसके कैचमेन्ट के 7ण्3 हेक्टेयर में काम किया। जिसमें लगभग दो बार में छह हजार से ज्यादा पौधों की बुआई की थी। इसके अतिरिक्त कैचमेन्ट में कंटूर टैंकए खालए चैकडैमए परकूलेसन पीड बनाए गए। ये सभी कार्य समीति के माध्यम से ग्रामीणों के सहयोग से किया गया। यह काम इतना आसान नहीं था इसमें एक विवाद सामने आया जिसमें गांव के गधेरे के बीच स्थित नौले के कैचमेंट को लेकर आया। नौला कुलागाड़ गांव की जमीन में है। लेकिन इसका कैचमेन्ट एरिया दूसरे गांव की जमीन में है। आपस में चार.पांच महीने की मीटिंग के बाद उन्हंे हम ये बता पाए की स्त्रोत कितना जरूरी है। उनको भी लगा ये सही काम कर रहे है।
कुलगाड़ कैचमेन्ट एरिया में दो प्रकार के पत्थर है। एक है क्वाडजाईट और दूसरा फलाईट एवं यहां पत्थरों का उत्तरी पूर्वी ढलान है। क्वाटजाईटए यह कठोर होता है जो पानी को रोकता है। इसे स्थानीय भाषा में डासी पत्थर बोलते है। दूसरा फलाईट जिसमें अलग अलग परतें होती हैं। यह अपनी परतों में पानी को रोक के रखता है और धीरे धीरे छोड़ता है। फलाईट में फैक्चर यानी दरारें है जिसके द्वारा पानी धीरे.धीरे नौले की ओर जाता है। पहले हमारे नौले में 4 एलपीएम पानी था अब 14 एलपीएम रहता है। इसके साथ प्रतिमाह पानी को नापतें है और जांच करते है। इसके अम्लीयता और छारीयता की जांच करते है। चिराग संस्था के एरिया मैनेजर भीम सिंह नेगी कहते है कि समुदाय के माध्यम से इस कुलगाड़ के कैचमेन्ट एरिया में 2013.15 के बीच हमने खाल.चालए कंटूर ट्रन्चए वृक्षारोपण का काम किया है। जिसके काफी अच्छे परिणाम आए। ग्रामवासी गर्मी के मौसम मेें आग बुझाने के लिए अपने प्रयास भी करते रहते है। आज ग्रामीण पानीए जंगल को लेकर जागरूक हैं यही हमारे काम की सफलता है।
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