शनिवार, 26 सितंबर 2015

गावों से दूर रहकर कहां जाएगें हम ?

      गावों के बिना भारत की कल्पना वैसे ही है, जैसे जड़ के बिना किसी पेड़ के अस्तित्व की। आजादी के समय भारत की कुल आबादी का 83 प्रतिशत गांव थे, वही आज यह घटकर 68 प्रतिशत रह गए हैं। इसके विपरित शहरों की आबादी 17 प्रतिशत से बढ़कर 31 प्रतिशत हो गई हैं। गावों से लगातार दूर जाने की इस परंपरा से एक ओर जहां गांव खाली हो गए है, वही दूसरी ओर शहरों में जनसंख्या विस्फोट की समस्या लगातार बड़ती जा रही है। 
भारत गावों में बसता है यह मात्र एक वाक्य नहीं है, बल्कि इनका प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व रहा है। गांव, भारत जैसे देश में अर्थव्यवस्था के लिए एक सशक्त माध्यम रहे है, जो अनाज, फल, सब्जी, दूध एवं अन्य अनेक उत्पादों का प्रमुख स्त्रोत है। लेकिन आज स्थिति लगातार विपरित होती जा रही हैं। आकड़ों के अनुसार शहरों में रहने वाले 40 प्रतिशत से ज्यादा परिवार मात्र एक कमरे में रहकर ही अपना जीवन काट रहे हैं। इसके बावजूद भी लोग रोजगार एवं पढ़ाई के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यह पलायन कुछ हद तक विकास एवं वृद्धि के लिए है, लेकिन पलायन के स्थायी रूप ने इसे समस्या बना दिया है। वैश्वीकरण के बाद शहरों एवं गावों के बीच की बड़ती खाई की ने एक नए विवाद को जन्म दिया है। जो हमारे सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना को आघात पहुंचा रहा हैं। नई पीढ़ी के मन में भारतीय संस्कृति के प्रति उदासीनता एवं हर रोज पनपते नए अपराधों इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सांस्कृतिक पतन, मानवीय मूल्यों के ह्रास एवं पाश्चात्य संस्कृति के प्रति बढ़ती रूचि भी इसके ही परिणाम हैं।


गांव में दादी, नानी की कहानी तो होती ही थी, साथ में जीवन जीने के सूत्र भी दिये जाते थे। लेकिन आज गांव से लोग भाग रहे है या कहे वे मजबूर है, भागने के लिए। मूलभूत आवश्यकताओं की कमी, बेरोजगारी, शहरों के प्रति अत्यधिक रूचि एवं सांस्कृतिक आधार कमजोर पड़ने की से यह पलायन और बड़ गया हैं। लेकिन हमें इस बात को सोचना होगा की इस दौड़ का अंतिम बिंदु वही है जहां से यह दौड़ शुरू हुई थी, यानी गांव, यहां से दूर रहकर हम कहां जाएगे। एक न एक दिन तो वापस आएगे, अपने मूल की ओर, अपने जड़ो की ओर।

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