शनिवार, 23 मई 2015

मेरी कल्पना ............मेरा गांव!......


                                                                                     मेरी कल्पना का एक गांव, जो कभी हकीकत में था। आज कही खो गया है, सो गया है, गांधी का 

वो ग्रामसेवक। बस बची है तो एक कल्पना.... और दर्द से निकली एक उम्मीद।

                               मेरा गांव!......


बहुत सारें घर, पर पता एक .........एक ही परिवार।

भूरी जमीन, नीला आसमान, हरे जंगल.

गोर ,काला, भूरा हर रंग में इंसान.

बचपन, पछपन, सब अनुभव है यहां,

हंसी, भूख, दुःख, उम्मीद दर्द प्यार हर सफर है यहां,

खेत, हरियाली ,गांय, और प्रकृति की असल आनंद है यहां

भाई, काका, ताई हर रिश्ते का असर है यहां.

पड़ोसी, आँगन, चिडि़या की चहचहाट है यहां.

खुली हवा, साफ पानी, दादी की कहानी, है यहां.

ख़ुशी के बाराती, दुःख के साथी हैं यहां.

बारिश का पानी, वसंत की हरियाली है यहां.

सर्दी में गुड़ वाली चाय और गर्मी में मीठा ठंडा पानी है यहां.

छप्पर वाली दुकान, छोटे मकान, बड़ी सोच वाला इंसान हैं यहाँ.

मिट्टी से सने कपड़े में, दिल के साफ आदमी है यहां.

संस्कार, सभ्यता, असली हिन्दुस्तानी सस्कृति है यहां.

शनिवार, 2 मई 2015

विस्थापन का दर्द और विकास का मरहम

जाते हुए लोग शायद ही किसी को अच्छे लगते हो। लेकिन आज उत्तराखण्ड में हर रोज कोई न कोई अपना घर छोड़ने को मजबूर है। यहां के लोग पेट के भूगोल के कारण अपने पुस्तैनी जमीन छोड़ने को विबश है। मूलभूत संसाधानों की कमी और बेरोजगारी के कारण पहाड़ के गावों में आज बस, तालें लगे मकान और मुरझाएं से कुछ चेहरे ही शेष बचे है। पहाड़ी गांव विस्थापन के दर्द से कराह रहे हैं।
पहाड़ की वादियों में रहने वाले लोग मेहनती होते है, पर अफसोस अब उनकी उम्मीद टूटती जा रही है। आज पहाड़ से, उसका पानी और जवानी दोनों रूठ गई है क्योंकि विकास बनाम विस्थापन की दौड़ में विस्थापन जीतता नजर आ रहा है। आकड़ों के अनुसार विस्थापित होने वालों लोगों में ज्यादातर संख्या युवाओं की है जो पहले शिक्षा के लिए फिर रोजगार के लिए गावों को छोड़ने को मजबूर हो रहे है। उत्तराखण्ड में 69.77 प्रतिशत जनसंख्या पहाड़ी गावों में रहती है लेकिन कुछ वर्षों से शहरों में विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
उत्तराखण्ड राज्य में विस्थापन की घटना बहुत पुरानी है लेकिन वैश्वीकरण के पश्चात् विस्थापन ने महामारी का रूप ले लिया। पहाड़ी गावों में मूलभूत सुविधा के अभाव, रोजगार के अल्पसाधनों का होना इसकी मुख्य वजह है। पहले जहां घर का एक सदस्य बाहर जाकर काम करता था वही आज अपने बच्चों की शिक्षा दीक्षा एवं उज्जवल भविष्य की चिंता के कारण पूरा परिवार ही अपनी विरासत और संस्कृति से दूर दिल्ली, पंजाब जाने को मजबूर हो रहा है। इसके अतिरिक्त एक और प्रकार का विस्थापन होता है जिसमें लोग अपने गावों को छोड़कर आसपास के शहरों में जाकर बस जाते है, जिससे उस शहर में जनसंख्या दबाव की समस्या उत्पन्न होने लगती है। कुल मिलाकर देखंे तो यह भयावह दर्द हर रोज नई समस्या को जन्म दे रहा है । एक ओर गांव खाली हो रहे है वही आसपास के शहरों में संसाधनों पर जनसंख्या का भार बड़ता जा रहा है। इस सबके साथ आने वाली पीढी़ अपनी संस्कृति, मूल्यों एवं परंपराओं से दूर होती जा रही है।
किसी भी देश का पहाड़ी भूभाग उसके पर्यावरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। और विशेष तौर पर उत्तराखण्ड जैसा राज्य, जहां से दो प्रमुख नदियों, गंगा एवं यमुना, का उद्गम स्थल है, की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। लेकिन पलायन की महामारी ने सुन्दर गावों को भूताहा गावों में बदल दिया है।
गावों से भागतें लोगों की दःुखी आखों में निराशा होती है, दर्द होता है और साथ अनेक सवाल होते, उस क्षेत्र के विकास को लेकर। विकास तो होता है पर वह कभी राजनीति तो कभी अन्य कारणों की वजह से धरातल पर नहीं उतर पाता है। इसके लिए कुछ बातों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। पहला, विकास की प्रकिया में गांव के लोगों की पूरी भागीदारी हो, योजना बनाने से लेकर क्रियान्वयन तक उनका सहयोग लिया जाए। दूसरा, पंचायती राजव्यवस्था जो जितनी ताकत संविधान में दी गई है उसे हकीकत में परिणीत किया जाए, संस्था को गावों के विकास के लिए संपूर्ण अधिकार दिए जाए और तीसरा, लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ यानी मीडिया को पहाड़ के सवालों से विशेष इत्तेफाक रखने की जरूरत है, ताकि चारों ओर फैली निराशा को सकारात्मकता के वातावरण से मिटाया जा सके। वास्तव में इन्ही प्रयासों के माध्यम से पहाड़ी गावों में संव्याप्त विस्थापन के दर्द पर सुनियोजित विकास का मरहम लगाया जा सकता है।

उत्‍तराखंड के विकास के लिए सुझाव- आदर्श कुटीर योजना

पहाड़ के विकास का मॉडल उसकी मूल प्रकृति से जुड़ा होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए काम किए जाएं। लोगो...