मेरी
कल्पना का एक गांव,
जो कभी हकीकत
में था। आज कही खो
गया है, सो
गया है, गांधी
का
वो ग्रामसेवक। बस बची है तो एक कल्पना.... और दर्द से निकली एक उम्मीद।
वो ग्रामसेवक। बस बची है तो एक कल्पना.... और दर्द से निकली एक उम्मीद।
मेरा गांव!......
बहुत
सारें घर, पर
पता एक .........एक
ही परिवार।
भूरी
जमीन, नीला
आसमान, हरे
जंगल.
गोर
,काला,
भूरा हर रंग
में इंसान.
बचपन,
पछपन,
सब
अनुभव है यहां,
हंसी,
भूख, दुःख,
उम्मीद दर्द
प्यार हर सफर है यहां,
खेत,
हरियाली ,गांय,
और प्रकृति
की असल आनंद है यहां
भाई,
काका,
ताई हर रिश्ते
का असर है यहां.
पड़ोसी,
आँगन,
चिडि़या की
चहचहाट है यहां.
खुली
हवा, साफ
पानी, दादी
की कहानी, है
यहां.
ख़ुशी
के बाराती, दुःख
के साथी हैं यहां.
बारिश
का पानी, वसंत
की हरियाली है यहां.
सर्दी
में गुड़ वाली चाय और गर्मी
में मीठा ठंडा पानी है यहां.
छप्पर
वाली दुकान, छोटे
मकान, बड़ी
सोच वाला इंसान हैं
यहाँ.
मिट्टी
से सने कपड़े में, दिल
के साफ आदमी है यहां.
संस्कार,
सभ्यता,
असली हिन्दुस्तानी
सस्कृति है यहां.
