शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

पहाड़ के किसान दयानन्द जोशी की 45 साल की कहानी

Author: 
 मुकेश बोरा


दयानन्द जोशीदयानन्द जोशीउत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले में 25 परिवारों का छोटा सा गाँव है, गल्लाकोट। जहाँ रहते हैं 75 वर्षीय दयानन्द जोशी। अल्मोड़ा शहर से 32 किमी दूर, रानीखेत को जाने वाली रोड, गोविन्दपुर के पास पड़ता है दयानन्द का गाँव। वे लगभग 45 साल से सब्जी और फलों का उत्पादन कई कीर्तिमान स्थापित करते हुए कर रहे हैं। 15 किलो की मूली, 5 किलो की गड़री (अरबी की प्रजाति की सब्जी) के लिये उनको सम्मानित भी किया जा चुका है और मूली की इसी बीज को दयाकेसरी नाम रखने की प्रक्रिया भी चल रही है।

रोड से कुछ दूर पैदल ऊपर चढ़ने के बाद, लोगों से पूछते हुए मैं वहाँ पहुँचा। संयोगवश उनका बेटा रास्ते में घास काटते हुए मिल गया। रोड से थोड़े ऊँचाई पर उनका पुराने डिजाइन में बना घर था और चारों ओर खेत थे। उनसे मेरी पहली मुलाकात पॉलीहाउस में हुई, जहाँ झुकी हुई कमर से वे घास साफ कर रहे थे। मैंने प्रणाम किया ही था कि वे बोल पड़े, कुछ नहीं हो रहा है इस बार, पानी की कमी से सब सुख गया है, ऐसा कहते हुए वे मुझे खेत से आँगन में ले गए।

मेरे मन में उनके रंग-रूप और घर को लेकर अनेक जिज्ञासाएँ थीं, बड़े किसान हैं तो घर भी अच्छा ही होगा। घर की हालत और उनके परिवार की स्थिति देखकर निराशा हुई और मन में अनेक सवाल भी उपजे। पहाड़ी डिजाइन में बने घर में वे अपने बेटे और पोते के साथ रहते थे। पोता 11वीं में पढ़ता था, जिसे लेकर उनकी काफी शिकायतें थीं।

कोई खेती नहीं करना चाहता


इतनी उम्र होने के बाद भी वे खेती का सारा काम स्वयं ही करते हैं। वे कहते हैं कि खेती-किसानी आज के जमाने में गुजरे वक्त की बात हो गई है। गाँव के लड़के दिल्ली जैसे शहरों में जाकर सात-आठ हजार कमाते हैं लेकिन अपने खेतों में काम करके फल, सब्जी उगाना नहीं चाहते।

जब मैंने पूछा कि आप ये काम कब से करते आये हैं तो उन्होंने कहा कि जबसे मैंने होश सम्भाला तब से यही काम कर रहा हूँ। मेरे पास कोई डिग्री नहीं है बस मेरी जिज्ञासा, प्रयोगों एवं पिताजी के मार्गदर्शन से सिखता आया हूँ। वे आगे कहते हैं, 20-25 साल पहले यहाँ पास के कस्बों, दौलाघट और गोविन्दपुर में कोई दुकान नहीं थी, मैं सारी सब्जियाँ बेचने के लिये रानीखेत और सोमेश्वर की बाजार में जाता था। इतनी मेहनत करने के बाद भी यह लाभ का सौदा होता था। इस पूरे इलाके में मैंने पहली बार गोभी लगाई। वरना यहाँ के लोगों ने गोभी को बस दुकानों में ही रखे देखा था। जब मैंने उनसे पूछा कि आप तो सब्जियों के विशेषज्ञ हैं तो यहाँ सारे गाँव वाले सब्जी, फल का उत्पादन करते होंगे। वे बोले बेटा, उत्पादन तो दूर की बात ये लोग तो मुझे भी अच्छे से काम नहीं करने देते। इन्हीं लोगों की वजह से मैं पत्थर की दीवार लगा रहा हूँ, जिसमें भी इनको आपत्ति है इसलिये आजकल इसका काम रुका हुआ है।

मैंने आसपास के कई लोगों को कहाँ कि मैं आपको बीज लाकर दूँगा और साथ ही बताऊँगा भी कि कैसे लगाना है। विडम्बना देखो भूटान, नेपाल, सिक्किम, दार्जिलिंग के लोग मेरी बात मानकर काम कर रहे हैं और गाँव वालों के लिये घर की मुर्गी दाल बराबर है। इसी दौरान वे मुझे परिसर घुमाने ले गए, जहाँ उन्होंने गोभी, प्याज, टमाटर, मूली के अतिरिक्त अमरूद, अखरोट के पेड़ दिखाए। इसके अलावा उनके पास केरल से लाई इलाइची, हिमाचल से लाए गए जापानी फल जैसे अनेक पेड़ थे, जो इस वातावरण में नहीं होते थे जिसे उन्होंने जिज्ञासा एवं प्रयोग के नाते लगाया था।

पानी की कमी विकट समस्या


पानी की कमी की बात को उन्होंने कई बार कहा कि पहले तो नियमित पानी रहता था, पर पिछले कुछ सालों से पानी कम आता है। दयानन्द जी ने अपने घर में पानी के दो कनेक्शन लिये हुए हैं। उन्होंने पानी की कमी के कारण ही अपने पैसों से 18 मीटर चौड़ा 15 मीटर लम्बा और 6 मीटर गहरा मजबूत कंकरीट का तालाब बनाया हुआ था। जो 2012 की आपदा के दौरान थोड़ा टूट गया था जिसके कारण उसमें अब पानी ज्यादा दिनों तक नहीं रुक पाता था।

विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसन्धान केन्द्र


जब मैंने सरकारी योजना एवं आर्थिक सहायता पर सवाल पूूछा तो वे उत्तेजित होकर बोले, जो मैंने कमाया था, सब इन खेतों में लगा दिया, कहीं से आर्थिक सहायता नहीं मिली। उनके खेत में लगे विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसन्धान केन्द्र के बोर्ड को देखकर मैंने पूछा कि क्या ये कुछ सहायता करते हैं?

अपने खेतों में फसल दिखाते दयानन्द जोशीअनुसन्धान केन्द्र के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक भट्ट का नाम लेकर बोले कि एक बार मैंने उनसे बीज माँगे और उनके रख-रखाव के लिये संस्थागत सहायता की बात कही लेकिन उनका कहना था कि हमारा काम अनुसन्धान करना है। बस एक मर्तबा यहाँ गोभी के विशेष बीजों को प्रयोग के तौर पर लगाया गया, तब नियमित अन्तराल में अनेक वैज्ञानिक आते थे और जब प्रयोग खत्म हुआ तो उनका आना और उनका सहयोग भी बन्द हो गया। पहले मैं उनकी मीटिंग में जाया करता था लेकिन समय और स्वास्थ के कारण अब नहीं जा पाता हूँ।

रानीखेत के एनजीओ, लोक चेतना मंच ने मेरा बहुत उपयोग किया। हालांकि मुझे सम्पूर्ण भारत के साथ भूटान की यात्रा भी कराई। वे मुझे विभिन्न जगहों में ले जाकर खेती की परम्परागत तरीकों पर बताने को कहते थे कि कैसे आसपास की चीजों से कीटाणुनाशक बनाया जा सकता है, कौन सी जगह पर क्या हो सकता है आदि आदि। पूरे साल भम्रण के बाद जब मैंने उनसे अपने खेतों की चारों ओर पत्थर की दीवार के लिये सहयोग करने को कहाँ तो उन्होंने मना कर दिया। तब से आज तक न वे यहाँ आये और न मैंने उनसे बात की। न जाने उन्होंने मुझसे कितने रुपए कमाए।

तमाम बातों के बाद जब मैंने उनसे कहा कि आखिर वे कौन सी वजह है कि आप 45 सालों के बाद भी इस व्यवसाय को आस-पास के लोगों तक नहीं पहुँचा सके? वे बोले ऐसा नहीं है कि कोई प्रेरित नहीं हुआ, जो व्यक्तिगत रूप से जुड़ा उसे मैंने सहयोग किया। लेकिन आसपास के गाँव का माहौल खेती के सकारात्मक नहीं हो पाया। इसकी सबसे बड़ी वजह सरकारी संस्थाओं का असहयोग है। जब वे मुझे प्रोत्साहन नहीं दे सकते हैं, तो वे एक नए किसान की क्या सहायता करेंगेे।
http://hindi.indiawaterportal.org/Dayanand-Joshi

मैदानी क्षेत्र में विकास, पहाडी़ इलाका है अब भी निराश


उत्तराखंड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर देश का 27 वां राज्य बना। इस पहाड़ी राज्य का कुल क्षेत्रफल 53.483 वर्ग किमी है, जो भारत के कुल क्षेत्रफल का 1.63 प्रतिशत है। राज्य की जनसंख्या 1.01 करोड़ है जो देश की कुल आबादी का 0.83 प्रतिशत है। 53,483 वर्ग किमी कुल क्षेत्र में से 34,650 वर्ग किमी लगभग 66 प्रतिशत वन क्षेत्र है। भारत के उत्तर भारत में स्थित राज्य का सामरिक रूप से भी महत्वपूर्ण है इसकेे उत्तर दिशा में चीन व तिब्बत और पूर्व में नेपाल देशों से सीमा लगती है। गंगा यमुना नदियों के उद्गम के साथ राज्य में चार धामों में बद्रीनाथ जैसे पवित्र धार्मिक स्थल है। विश्व विरासत में स्थान पा  चुका फूलों की घाटी भी राज्य में है। इसके अतिरिक्त राज्य प्रमुख औषधियों एवं जैवविविधता का भंडार है।
उत्तराखंड दो मंडलों में विभाजित है। एक कुमाउ और दूसरा गढ़वाल। यहां कुल 13 जिले है, जिसमें 4 मैदानी और 9 पहाड़ी है। कुल क्षेत्रफल का 90 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी है। लगभग 30 लाख से ज्यादा शहरी आबादी है और 70 लाख से ज्यादा ग्रामीण है। यहां कुल आबादी में 30.55 शहर है और 69.45 प्रतिशत गांव है।
विस्थापन- 
2000 से 2011 के बीच के आंकडों के आधार पर जनसंख्या में वृद्धि असमानता दिखती है। एक ओर जहां चार मैदानी जिलों नैनीताल-25.2, देहरादून-32.48, उधमसिंह नगर-33.4 और हरिद्वार-33.16 प्रतिशत जनंसंख्या की बढ़ोतरी हुई है। वही इन दस सालों में अल्मोड़ा-1.73 और पौढ़ी गढ़वाल -1.51 प्रतिशत जनसंख्या में गिरावट देखी गई। जो लगातार हो रहे विस्थापन की ओर इंगित करता है। विस्तापन के प्रमुख कारणों में बेरोजगारी और शिक्षा के उचित संशाधनों का अभाव है। यहां चार प्रकार के विस्थापन देखने को मिलते है, जिनमें रोजगार के लिए पुरूष का और शादी के कारण महिलाएं का राज्य से बाहर जाती है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग अपने गावों को छोड़कर आसपास के शहरों में आकर रहने लगते है जिसे अंर्तराज्यीय विस्थापन कहा जाता है। साथ ही कुछ लोग एक जिले से दूसरे जिले में कतिपय कारणों से विस्थापित हो जाते है और इनमेें से कुछ देश के बाहर शिक्षा दिक्षा के लिए विस्थापन करते है। विस्तापन राज्य की लगातार खतरनाक हो रही समस्या है।
जनसंख्या की असमानता-
राज्य में जनसंख्या की असमान वितरण देखने को मिलता है। एक ओर जहां उत्तरकाशी जिले में कुल राज्य की कुल जनंसंख्या का 3.26 प्रतिशत आबादी निवास करती है और जिले का जनसंख्या धनत्व 41 वर्ग किमी है। वहीं दूसरी ओर राज्य के एक अन्य जिले हरिद्वार की जनंसंख्या 19.05 प्रतिशत है और वहां का जनंसंख्या धनत्व 817 है। ध्यात्वय हो कि उत्तराख्ंाड का जनसंख्या धनत्व औसत 189 और देश का औसत धनत्व 382 है। इस प्रकार  एक आकड़े के अनुसार 9 पहाड़ी जिलों की जनसंख्या 38.43 प्रतिशत है और 4 मैदानी जिलों की आबादी का प्रतिशत 61.57 है। इस असमान जनसंख्या वितरण को असमान संशाधनों के वितरण के रूप में भी देखा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत आवश्यकताओं की कमी रहती है वही मैदानी जिलों में रोजगार के साधनों के साथ रोड़, स्कूल, चिकित्सालयों की उचित व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त गावों से लगातार लोगों का पलायन हो रहा है। 2001 में 16,826 गांव थे जो 2011 में 16,793 गांव हो गए  है और भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
असमान आर्थिक वितरण- 
हालिया वल्र्ड बैंक ने डीआईपीपी के साथ मिलकर निकाली व्यापार सुगमता रिर्पोट के आधार पर उत्तराखंड राज्य अपने पिछले स्थान 23 से 9 वे नंबर पर आ गया है। एसोचैम के आर्थिक अनुसंधान ब्यूरो की रिर्पोट में उत्तराखंड एक दशक में उद्योग और सेवा क्षेत्रों में सबसे आगे रहा है। ताजा अध्ययन के अनुसार 2004-05 से 2014-15 में उद्योग क्षेत्र में 16.5 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र में 12.3 प्रतिशत सालान वृद्धि हासिल की है। जो साल प्रतिशत की औसत सालाना वृद्धि के मुकाबले कही आगे है। उत्तराखंड सीएजीआर में शीर्ष पर है। इस अवधि के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में उत्तराखंड का योगदान 0.8 प्रतिशत से बढ़कर 1.2 तक पहुच गया है। इन सब के बावजूद पिछले दस सालों में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। यह 22 प्रतिशत से लुढ़कर 9 प्रतिशत पर पहुंच गया है। राज्य की 75 प्रतिशत से ज्यादा आबादी आज भी कृषि पर निर्भर करती है। उत्तराखंड औषधीय पौधों के मामले में बहुत महत्वपूर्ण है यहां 175 प्रकार की विरल औषधी मिलती है। इसके अतिरिक्त फल, सब्जी और औषधी उत्पादन की दृष्टि से राज्य की भूमि उर्वर है। इन सब के बावजूद यह वानिकी के क्षेत्र में हिमालच और अन्य राज्यों की तुलना में काफी पीछे है।
मैदानी जिले हरिद्वार, नैनीताल, उधमसिंह नगर और देहरादून जिलों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान है। उघोग निदेशक उत्तराखंड के आंकड़े के अनुसार दिसंबर 2012 में 230 उघोग थे जिनमें 274,501.81 करोड़ का निवेश किया गया और जो 85,333 लोगों को रोजगार देती थी। इन उघोगों का उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र तक सिमित होने की वजह से 90 प्रतिशत पहाड़ी भाग पिछड़ता जा रहा है। एक ओर जहां आकड़ों के आधार पर राज्य अव्वल बना है वही दूसरी ओर इन पर गंभीरता से विचार करने पर पता चलता है कि यह मात्र चार जिलों के तक सिमित है। राज्य में पर्यटन एक बड़ा आर्थिक माध्यम है। पर्यटन 2013-14 में 20.03 लाख से 2014-15 में 22.09 लाख हो गया है। चार धाम  और पहाड़ी क्षेत्रों में धूमने के लिए हर साल सैलानी उत्तराखंड आते है। यह धार्मिक पर्यटन के साथ स्वास्थ्य, साहसिक पर्यटन का मुख्य क्षेत्र रहा है। लेकिन दूर्भाग्य है कि राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से पर्यटन के लिए सुनियोजित माडॅल नहीं बन पाया है।
कारण 
उत्तराखंड के बदहाल हालत के कारणों की बात करें तो सबसे पहले राजनैतिक अस्थिरता है। 16 सालों में राज्य 8 मुख्यमंत्री देख चुका है। जिसमें नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए है। इसके आलावा एक बहुत बड़ा कारण के उत्तर प्रदेश के माडॅल पर पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के विकास करने की बात की जा रही है। भले ही उत्तर प्रदेश से अलग हुए 16 साल हो गए है परंतु आज भी देहरादून में बैठी सरकार वही काम कर रही है जो लखनउ में बैठकर करती थी। 1979 में उत्तर प्रदेश के तत्कालिन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव ने कहा था कि क्या प्रदेश में पहाड़ भी है? इन चितांओं को ध्यान में रखकर ही 2000 में अलग उत्तराखंड राज्य की स्थापना की गई। लेकिन हालत आज भी जस की तस है। 90 प्रतिशत पहाड़ी राज्य की राजधानी देहरादून होना एक और बड़ा बाधक है विकास में। सन् 1984 में जब सबसे पहले अलग उत्तराखंड राज्य की मांग उठी थी तभी से चमोली जिले में स्थित गैरसैण को राजधानी बना दिया गया था। लेकिन आज भी यह मामला राजनितिक घोषणा पत्रों में लटका पड़ा है।
आज पहाड़ी जिलों में लोंगों में निराशा है भय है। निराशा सरकार से और भय प्राकृतिक आपदाओं का । इस वजह से वे अपने घरों को छोड़कर कही भी जाने को मजबूर है। इसके चलते राज्य में भूताहा गावों की संख्या बढ़ती जा रही है। खेत बंजर हो रहे है घर खाली हो रहे है। राजनेताओं के बीच एक और वर्ग है जो ठेकेदार है। चाहे वो भूमाफिया हो, खनन हो, स्कूल, रोड़ के निर्माण की धांधली हो इनके पीछे ये ही गिरोह है। जो राज्य में दीमक की तरह काम कर रहा है। प्राकृतिक संशाधनों से भरापूरा राज्य उत्तराखंड बेहाल हो रहा है तो उसमें राजनेताओं के साथ ठेकेदारों का भी बहुत बड़ा हाथ है।
क्या है जरूरी
आज राज्य में सामाजिक एवं सांस्कृतिक बनावट के साथ विकास करने की जरूरत है। साथ ही राज्य की पर्यावरणीय चिंता के साथ विकास के माडॅलों का नियोजन करना चाहिए। फल, सब्जी उत्पादन के साथ सरकार को पर्यटन एवं कुटीर उघोगों को बढ़ावा देकर राज्य में बेरोजगारी की चिंता से लड़ा जा सकता है। इस सब के साथ राज्य में दबाव समूहों, गैर सरकारी संगठनों को भी सामाजिक एवं राजनैतिक चेतना जगाने का काम करना चाहिए।

उत्‍तराखंड के विकास के लिए सुझाव- आदर्श कुटीर योजना

पहाड़ के विकास का मॉडल उसकी मूल प्रकृति से जुड़ा होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए काम किए जाएं। लोगो...