सोमवार, 30 नवंबर 2015

पहाड़ की नारी पहाड़ सी नारी ...

            वो स्त्री ही है जो पहाड़ के पहाड़ जैसे जीवन में प्रसन्नता पूर्वक रहती है।

मैं जब भी अपने मां को देखता हूं तो मुझे चेहरे की झुर्रियों के बीच साहस और हिम्मत दिखायी देती है।

आजकल रात जल्दी होने लगती है और पहाड़ी इलाकों में ठण्ड भी बहुत होती है। दीपावली के बाद से ही सुबह शाम ठण्डक का अहसास होने लगता है। अबकी बार जब में अपने गांव गया, तो फिर से वही बचपन के दिन याद आ रहे थे। मां अक्सर सूरज अस्त होने के बाद ही खेत से घर आती थी लेकिन आज वो जल्दी आ गयी। शायद किसी ने उसे मेरे आने की खबर खेत तक पहुचां दी थी। पहाड़ी गांव में घरों के बीच कितनी भी दूरी क्यों न हो लेकिन उसके बीच जुड़ाव और वार्तालाप में काफी सघनता होती है। जो आज शहरों में देखने को कम मिलती है। इतनी ठंड में मां जब घास का डेर लेकर आ रही थी तो उसे पसीना आ रहा था। वो थक चुकी थी लेकिन काम खत्म नहीं हुआ था। अभी रात का खाना, घर में पानी रखना और भी बहुत काम बचे थे। वह बिना थके बिना रूके कमर को झुकाए सूरज के साथ, सूरज के बाद भी पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियों का पालन हंसते हुए करती है। वो स्त्री ही है जो पहाड़ के पहाड़ जैसे जीवन में प्रसन्नता पूर्वक रहती है। रोजाना पानी, ईधन, चारा के लिए कई मील का सफर तय करती है। इसके साथ नामकरण, विवाह, पर्व-त्यौहारों एवं रिश्ते नातों की डोर को मजबूती से संभाले हुए वह पहाड़ की सास्कृतिक विरासत को बचाए हुए है। 

पहाड़ों में अमूमन लोग जल्दी सो जाते है। लेकिन टीवी के आ जाने के बाद इसमे कुछ बदलाव आए है। सुबह की ताजी ठंडी हवा के साथ एक दिनचर्या शुरू होती है। जानवरों को घास देना, दूध निकालना और आंगन की सफाई करने से कार्य प्रारम्भ होता है। उनके लिए मौसम मायने नहीं रखता, मायने रखता है तो जिम्मेदारी और काम। इसी सिद्धान्त के साथ वो दिन भर बिना रूके लगी रहती है। कमजोर शरीर होने के बावजूद भी उनका संकल्प पहाड़ की तरह होता है। चाहे रात हो या दिन, धूप हो या बारिश, पेड़ हो या पहाड़ वो हरदम तत्पर रहती है। अपनी भूमि से लगाव उसकी सबसे बड़ी खूबी है, आज इसी चीज की समाज में कमी देखने को मिलती है। पहाड़ घूमने वाले के लिए जितना खूबसूरत हैं, उतना ही कठिन वहां के निवासियों के लिए होता है। उत्तराखंड का लगभग 90 प्रतिशत भाग पहाड़ी है। जिस कारण यहां के पुरूषों को रोजगार के लिए अक्सर घर से दूर मैदानी भागों में जाना पड़ता हंै। ऐसे में परिवार की पूरी जिम्मेदारी महिला पर आ जाती है। घर परिवार, बुर्जगों की देखभाल, जानवरों की चारें की व्यवस्था के साथ साथ रिश्ते नातों को निभाना भी उसी का काम रहता है। वो सुबह से रात तक परिवार की धुरी में घुमती रहती है। मैं जब भी अपने मां को देखता हूं तो मुझे उसके चेहरे की झुर्रियों के बीच साहस और सर्मपण दिखायी देती है। क्योंकि पहाड़ों में महिलाएं को अपने परिवार की खातिर माता और पिता की भूमिका को निभाना पड़ता है। एक ओर जहां वह घर से खेत तक का सारा काम करती है वही वह बच्चे के स्कूल से लेकर बुर्जेगों की दवाओं का भी ख्याल रखती है। न ज्यादा उम्मीद और न ज्यादा चाहत बस थोड़े से अरमान की परिवार, गांव खुशहाल रहे। सही मायने में देखे तो वो त्याग की मूर्ति है। कहते भी है की पहाड़ की औरतों की कभी जवान नहीं हो पाती क्योंकि या तो वोे किशोरावस्था में होती है या फिर विवाह के बाद जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए बुर्जग हो जाती है। कुल साल पहले के एफएओ के एक अध्ययन के अनुसार एशिया में सबसे ज्यादा काम हिमालयी क्षेत्र महिलाएं करती है। हिमालयी क्षेत्र में एक पुरूष प्रतिवर्ष प्रति हेक्टेअर औसतन 1212 घंटे और महिलां 3485 घंटे काम करती है। यानी महिला पुुरूष के काम का अनुपात 294 अनुपात 101 का है। कृषि में महिलाओं का योगदान 60 से 80 और अन्य गतिविधियों में 60-80 प्रतिशत तक रहता है। इसके अतिरिक्त अध्ययन मेें बताया गया है कि महिलाएं ही हिमालयी क्षेत्र के विस्थापन की समस्या को रोक सकती है। 

आज समाज मेें एक ओर जहां उपभोगक्तावाद के दौर में नारी की पवित्रता पर आंच आयी है, उसे केवल विज्ञापन की वस्तु के तौर पर ही देखा जा रहा है। ऐसे वक्त में पहाड़ी क्षेत्र में महिलाएं अपने कर्तव्य पथ पर पूरी निष्ठा के साथ लगी रहती है। उसकी इसी विशेषता के कारण यहां की सामाजिक संरचना में उसका एक अनूठा योगदान है। पहाड़ी क्षेत्रों में विशेषतौर पर उत्तराखंड की बात करें तो महिलाओं की अमर गाथा की अनेक कहानियां लोगों की जुबान पर आज भी जीवंत है। जहां देवी स्वरूपा नारियों ने हर मोर्च पर परचम लहराया है। उत्तराखंड के अतीत में सबसे पहले रानी कर्णावती का उल्लेख मिलता है जिन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना से लोहा लिया। वीरबाला तीलू रौतेला, मालू रौतेला आदि वीरांगनाओं का वर्णन केवल लोक गीतों में ही मिलता है। 1805 से लेकर 1815 के बीच उत्तराखंड राज्य में गोरखा राज रहा। उस दौरान सबसे ज्यादा परेशानी यहां की महिलाओं का ही हुआ। इस दौर में अपने साहसिक कारनामों के कारण कोलिण जगदेई को आज लोकदेवी के रूप में पूजा जाता है। इसी क्रम में आजादी के दौर में विशनी देवी शाह, जिन्हे पहली बार आजादी के लिए जेल जाना का अवसर प्राप्त हुआ। यहां महिलाओं ने पुरूषों से एक कदम आगे रहकर परिवार, समाज, राजनीति, पर्यावरण हर क्षेत्र में अपना योगदान दिया है। उत्तराखंड में ऐसे अनेक उदाहरण है। चिपकों आंदोलन की सूत्रधार रैणी गावं की गौरा देवी को तो पूरी दुनियां जानती है जिन्होंने पर्यावरण और सामाजिक कुरितियों के खिलाफ र्मोचा खोला था। पहाड़ की तीजनबाई के नाम से प्रसिद्ध लोक गायिका कबूतरी देवी ने गायन की कोई शिक्षा नहीं ली लेकिन अपने गायन के माध्यम से हमेशा सामाजिक चेतना जगाते रही। इसके अतरिक्त राज्य आंदोलनकारी सुभाषिनी बर्थवाल, भारत की प्रथम महिला एवरेस्ट विजेता पद्मश्री बछेन्द्रीपाल, द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित हंसा मनराल शर्मा, क्रिकेटर एकता विष्ट, समाजसेवी वंदना शिवा , राज्य निर्माण आंदोलन में कौशल्या डबराल, सुशीला बलूनी, सामाजिक चेतना जागरण मेें मंगलादेवी उपाध्याय, गांधीजी की शिष्या सरलादेवी ने पर्वतीय महिलाओं के कल्याण के लिए कौसानी में लक्ष्मी आश्रम नामक संस्था की स्थापना की, नशा मुक्ति आंदोलन में कुंतीदेवी वर्मा, तुलसी रावत, दुर्गावती पंत  ने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त आदि नामों के साथ यहां निवास करने वाली हर वो मां, बहन, बेटी, जिसने इस खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र को सींचने में अपना योगदान दिया है।

 ऐसी महान नारियों के कारण ही आज हिमालयी राज्य की आवोहवा में वो सुगंध है जिसकेा देश के हर कोन का इंसान महसूस करना चाहता है। वास्तव में नारी समाज की शिल्पकार होती है। कहा भी जाता कि जब एक पुरूष शिक्षित होता है तो एक व्यक्ति ही शिक्षित होता है लेकिन एक महिला के शिक्षित होने से पूरी पीढी़ शिक्षित हो जाती है। लेकिन इस सब के बाबजूद भी नारी को वो सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी वे वास्तव में हकदार रही है।


शनिवार, 26 सितंबर 2015

गावों से दूर रहकर कहां जाएगें हम ?

      गावों के बिना भारत की कल्पना वैसे ही है, जैसे जड़ के बिना किसी पेड़ के अस्तित्व की। आजादी के समय भारत की कुल आबादी का 83 प्रतिशत गांव थे, वही आज यह घटकर 68 प्रतिशत रह गए हैं। इसके विपरित शहरों की आबादी 17 प्रतिशत से बढ़कर 31 प्रतिशत हो गई हैं। गावों से लगातार दूर जाने की इस परंपरा से एक ओर जहां गांव खाली हो गए है, वही दूसरी ओर शहरों में जनसंख्या विस्फोट की समस्या लगातार बड़ती जा रही है। 
भारत गावों में बसता है यह मात्र एक वाक्य नहीं है, बल्कि इनका प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व रहा है। गांव, भारत जैसे देश में अर्थव्यवस्था के लिए एक सशक्त माध्यम रहे है, जो अनाज, फल, सब्जी, दूध एवं अन्य अनेक उत्पादों का प्रमुख स्त्रोत है। लेकिन आज स्थिति लगातार विपरित होती जा रही हैं। आकड़ों के अनुसार शहरों में रहने वाले 40 प्रतिशत से ज्यादा परिवार मात्र एक कमरे में रहकर ही अपना जीवन काट रहे हैं। इसके बावजूद भी लोग रोजगार एवं पढ़ाई के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यह पलायन कुछ हद तक विकास एवं वृद्धि के लिए है, लेकिन पलायन के स्थायी रूप ने इसे समस्या बना दिया है। वैश्वीकरण के बाद शहरों एवं गावों के बीच की बड़ती खाई की ने एक नए विवाद को जन्म दिया है। जो हमारे सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना को आघात पहुंचा रहा हैं। नई पीढ़ी के मन में भारतीय संस्कृति के प्रति उदासीनता एवं हर रोज पनपते नए अपराधों इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सांस्कृतिक पतन, मानवीय मूल्यों के ह्रास एवं पाश्चात्य संस्कृति के प्रति बढ़ती रूचि भी इसके ही परिणाम हैं।


गांव में दादी, नानी की कहानी तो होती ही थी, साथ में जीवन जीने के सूत्र भी दिये जाते थे। लेकिन आज गांव से लोग भाग रहे है या कहे वे मजबूर है, भागने के लिए। मूलभूत आवश्यकताओं की कमी, बेरोजगारी, शहरों के प्रति अत्यधिक रूचि एवं सांस्कृतिक आधार कमजोर पड़ने की से यह पलायन और बड़ गया हैं। लेकिन हमें इस बात को सोचना होगा की इस दौड़ का अंतिम बिंदु वही है जहां से यह दौड़ शुरू हुई थी, यानी गांव, यहां से दूर रहकर हम कहां जाएगे। एक न एक दिन तो वापस आएगे, अपने मूल की ओर, अपने जड़ो की ओर।

शनिवार, 23 मई 2015

मेरी कल्पना ............मेरा गांव!......


                                                                                     मेरी कल्पना का एक गांव, जो कभी हकीकत में था। आज कही खो गया है, सो गया है, गांधी का 

वो ग्रामसेवक। बस बची है तो एक कल्पना.... और दर्द से निकली एक उम्मीद।

                               मेरा गांव!......


बहुत सारें घर, पर पता एक .........एक ही परिवार।

भूरी जमीन, नीला आसमान, हरे जंगल.

गोर ,काला, भूरा हर रंग में इंसान.

बचपन, पछपन, सब अनुभव है यहां,

हंसी, भूख, दुःख, उम्मीद दर्द प्यार हर सफर है यहां,

खेत, हरियाली ,गांय, और प्रकृति की असल आनंद है यहां

भाई, काका, ताई हर रिश्ते का असर है यहां.

पड़ोसी, आँगन, चिडि़या की चहचहाट है यहां.

खुली हवा, साफ पानी, दादी की कहानी, है यहां.

ख़ुशी के बाराती, दुःख के साथी हैं यहां.

बारिश का पानी, वसंत की हरियाली है यहां.

सर्दी में गुड़ वाली चाय और गर्मी में मीठा ठंडा पानी है यहां.

छप्पर वाली दुकान, छोटे मकान, बड़ी सोच वाला इंसान हैं यहाँ.

मिट्टी से सने कपड़े में, दिल के साफ आदमी है यहां.

संस्कार, सभ्यता, असली हिन्दुस्तानी सस्कृति है यहां.

शनिवार, 2 मई 2015

विस्थापन का दर्द और विकास का मरहम

जाते हुए लोग शायद ही किसी को अच्छे लगते हो। लेकिन आज उत्तराखण्ड में हर रोज कोई न कोई अपना घर छोड़ने को मजबूर है। यहां के लोग पेट के भूगोल के कारण अपने पुस्तैनी जमीन छोड़ने को विबश है। मूलभूत संसाधानों की कमी और बेरोजगारी के कारण पहाड़ के गावों में आज बस, तालें लगे मकान और मुरझाएं से कुछ चेहरे ही शेष बचे है। पहाड़ी गांव विस्थापन के दर्द से कराह रहे हैं।
पहाड़ की वादियों में रहने वाले लोग मेहनती होते है, पर अफसोस अब उनकी उम्मीद टूटती जा रही है। आज पहाड़ से, उसका पानी और जवानी दोनों रूठ गई है क्योंकि विकास बनाम विस्थापन की दौड़ में विस्थापन जीतता नजर आ रहा है। आकड़ों के अनुसार विस्थापित होने वालों लोगों में ज्यादातर संख्या युवाओं की है जो पहले शिक्षा के लिए फिर रोजगार के लिए गावों को छोड़ने को मजबूर हो रहे है। उत्तराखण्ड में 69.77 प्रतिशत जनसंख्या पहाड़ी गावों में रहती है लेकिन कुछ वर्षों से शहरों में विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
उत्तराखण्ड राज्य में विस्थापन की घटना बहुत पुरानी है लेकिन वैश्वीकरण के पश्चात् विस्थापन ने महामारी का रूप ले लिया। पहाड़ी गावों में मूलभूत सुविधा के अभाव, रोजगार के अल्पसाधनों का होना इसकी मुख्य वजह है। पहले जहां घर का एक सदस्य बाहर जाकर काम करता था वही आज अपने बच्चों की शिक्षा दीक्षा एवं उज्जवल भविष्य की चिंता के कारण पूरा परिवार ही अपनी विरासत और संस्कृति से दूर दिल्ली, पंजाब जाने को मजबूर हो रहा है। इसके अतिरिक्त एक और प्रकार का विस्थापन होता है जिसमें लोग अपने गावों को छोड़कर आसपास के शहरों में जाकर बस जाते है, जिससे उस शहर में जनसंख्या दबाव की समस्या उत्पन्न होने लगती है। कुल मिलाकर देखंे तो यह भयावह दर्द हर रोज नई समस्या को जन्म दे रहा है । एक ओर गांव खाली हो रहे है वही आसपास के शहरों में संसाधनों पर जनसंख्या का भार बड़ता जा रहा है। इस सबके साथ आने वाली पीढी़ अपनी संस्कृति, मूल्यों एवं परंपराओं से दूर होती जा रही है।
किसी भी देश का पहाड़ी भूभाग उसके पर्यावरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। और विशेष तौर पर उत्तराखण्ड जैसा राज्य, जहां से दो प्रमुख नदियों, गंगा एवं यमुना, का उद्गम स्थल है, की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। लेकिन पलायन की महामारी ने सुन्दर गावों को भूताहा गावों में बदल दिया है।
गावों से भागतें लोगों की दःुखी आखों में निराशा होती है, दर्द होता है और साथ अनेक सवाल होते, उस क्षेत्र के विकास को लेकर। विकास तो होता है पर वह कभी राजनीति तो कभी अन्य कारणों की वजह से धरातल पर नहीं उतर पाता है। इसके लिए कुछ बातों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। पहला, विकास की प्रकिया में गांव के लोगों की पूरी भागीदारी हो, योजना बनाने से लेकर क्रियान्वयन तक उनका सहयोग लिया जाए। दूसरा, पंचायती राजव्यवस्था जो जितनी ताकत संविधान में दी गई है उसे हकीकत में परिणीत किया जाए, संस्था को गावों के विकास के लिए संपूर्ण अधिकार दिए जाए और तीसरा, लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ यानी मीडिया को पहाड़ के सवालों से विशेष इत्तेफाक रखने की जरूरत है, ताकि चारों ओर फैली निराशा को सकारात्मकता के वातावरण से मिटाया जा सके। वास्तव में इन्ही प्रयासों के माध्यम से पहाड़ी गावों में संव्याप्त विस्थापन के दर्द पर सुनियोजित विकास का मरहम लगाया जा सकता है।

बुधवार, 7 जनवरी 2015

गांव क्या है....

       गांव कहते ही मन में एक खुशनुमा एहसास जाग उठता है। खेत, खलियान, पालतु जानवर, किसान आदि अनेक चित्र कल्पना में आ जाते है। लेकिन क्या यह एहसास आज के युवामन में भी आते होंगे, यह चिंतन का विषय है ? गांव की कल्पना वही व्यक्ति कर सकता है जो कभी ऐसे माहौल में रहा हो, जिसका परिवार, नाते रिश्तेदारों ने इस  परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश की हो। पर आज कितने लेाग ऐसे है जो गांव जाना चाहते है, जाना तो चाहते है पर केवल घुमने के लिए। पर वहां बसने के लिए कोई नहीं जाना चाहता।
    आज की पड़ताल है गांव क्या है? इसकी खोज करना क्‍योंिक आज गांव हमारे मनों से कही खो से गए है। गांव, एक शब्द में कहूं तो सहयोग का दूसरा नाम  है। यकीन नहीं होता तो गांवों की पद्धतियों को स्मरण करके देखो। यहां सहयोग से तात्पर्य उस पवित्र परंपरा से है जिसके अतंर्गत गांव हर समय एक नेटवर्क की तरह जुड़ा रहता है। इतने बड़े समूह के तौर पर कुशल संचार प्रक्रिया का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता है। वृक्ष की जड़ की तरह गांव किसी भी समाज का मूल होता है। बिना पैर के शरीर जिस प्रकार असहाय हो जाता है, उसी प्रकार गांव से जुड़े बिना मनुष्य संस्कृति, संस्कारों से दूर हो जाती है।
गांव एक परंपरा का नाम है। यह संस्कारों की पाठशाला है। देश का प्रत्येक नागरिक गांव से अपनी शुरूआत करता है या कहे वह किसी न किसी रूप से गांव से जुड़ा होता है। गांव हर व्यक्ति के अंदर बीज बोने का काम करता है ताकि भविष्य में उसका फल समाज के काम आ सके। गंाव एक आनंद है जिसमें संतोष का सुख है। गांव अर्थव्यवस्था से राजव्यवस्था की धूरी है। लेकिन आखिर में इन सब विशेषताओं के सोचने के बाद हमें गांव की परिभाषाओं के बारे में क्यों सोचना पड़ रहा है। शायद इसलिए क्योंकि गांव आज हमसे दूर चले गए है या कहे गावों से हम दूर चले गए है। पर कितने दिनों तक हम अपनी जड़ों से दूर रह सकते है। कभी न कभी तो हमें उस ओर लोटना ही होगा।

उत्‍तराखंड के विकास के लिए सुझाव- आदर्श कुटीर योजना

पहाड़ के विकास का मॉडल उसकी मूल प्रकृति से जुड़ा होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए काम किए जाएं। लोगो...