यह एक पहल है, खुद के लिए ताकि मैं महसूस कर सकू, उस स्थान को जिसे हम गांव कहते है। यह एक शोध की तरह है, खोज है, उस एहसास का जो गांवों में बसता है। इसके माध्यम से हर वो बात कहने का प्रयास होगा, जो गांव से जुड़ी है। यह अध्ययन, अनुभव, संवेदना एवं विकास के समन्वय से प्रस्फुटित अभिव्यक्ति है। ’’मेरे गांव से’’ एक शुरुआत है, उस कल्पना की जिसे एक दिन हकीकत में बदलना है।
सोमवार, 30 नवंबर 2015
शनिवार, 26 सितंबर 2015
गावों से दूर रहकर कहां जाएगें हम ?
गावों के बिना भारत की कल्पना वैसे ही है, जैसे जड़ के बिना किसी पेड़ के अस्तित्व की। आजादी के समय भारत की कुल आबादी का 83 प्रतिशत गांव थे, वही आज यह घटकर 68 प्रतिशत रह गए हैं। इसके विपरित शहरों की आबादी 17 प्रतिशत से बढ़कर 31 प्रतिशत हो गई हैं। गावों से लगातार दूर जाने की इस परंपरा से एक ओर जहां गांव खाली हो गए है, वही दूसरी ओर शहरों में जनसंख्या विस्फोट की समस्या लगातार बड़ती जा रही है।
भारत गावों में बसता है यह मात्र एक वाक्य नहीं है, बल्कि इनका प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व रहा है। गांव, भारत जैसे देश में अर्थव्यवस्था के लिए एक सशक्त माध्यम रहे है, जो अनाज, फल, सब्जी, दूध एवं अन्य अनेक उत्पादों का प्रमुख स्त्रोत है। लेकिन आज स्थिति लगातार विपरित होती जा रही हैं। आकड़ों के अनुसार शहरों में रहने वाले 40 प्रतिशत से ज्यादा परिवार मात्र एक कमरे में रहकर ही अपना जीवन काट रहे हैं। इसके बावजूद भी लोग रोजगार एवं पढ़ाई के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यह पलायन कुछ हद तक विकास एवं वृद्धि के लिए है, लेकिन पलायन के स्थायी रूप ने इसे समस्या बना दिया है। वैश्वीकरण के बाद शहरों एवं गावों के बीच की बड़ती खाई की ने एक नए विवाद को जन्म दिया है। जो हमारे सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना को आघात पहुंचा रहा हैं। नई पीढ़ी के मन में भारतीय संस्कृति के प्रति उदासीनता एवं हर रोज पनपते नए अपराधों इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सांस्कृतिक पतन, मानवीय मूल्यों के ह्रास एवं पाश्चात्य संस्कृति के प्रति बढ़ती रूचि भी इसके ही परिणाम हैं।
गांव में दादी, नानी की कहानी तो होती ही थी, साथ में जीवन जीने के सूत्र भी दिये जाते थे। लेकिन आज गांव से लोग भाग रहे है या कहे वे मजबूर है, भागने के लिए। मूलभूत आवश्यकताओं की कमी, बेरोजगारी, शहरों के प्रति अत्यधिक रूचि एवं सांस्कृतिक आधार कमजोर पड़ने की से यह पलायन और बड़ गया हैं। लेकिन हमें इस बात को सोचना होगा की इस दौड़ का अंतिम बिंदु वही है जहां से यह दौड़ शुरू हुई थी, यानी गांव, यहां से दूर रहकर हम कहां जाएगे। एक न एक दिन तो वापस आएगे, अपने मूल की ओर, अपने जड़ो की ओर।
शनिवार, 23 मई 2015
मेरी कल्पना ............मेरा गांव!......
मेरी
कल्पना का एक गांव,
जो कभी हकीकत
में था। आज कही खो
गया है, सो
गया है, गांधी
का
वो ग्रामसेवक। बस बची है तो एक कल्पना.... और दर्द से निकली एक उम्मीद।
वो ग्रामसेवक। बस बची है तो एक कल्पना.... और दर्द से निकली एक उम्मीद।
मेरा गांव!......
बहुत
सारें घर, पर
पता एक .........एक
ही परिवार।
भूरी
जमीन, नीला
आसमान, हरे
जंगल.
गोर
,काला,
भूरा हर रंग
में इंसान.
बचपन,
पछपन,
सब
अनुभव है यहां,
हंसी,
भूख, दुःख,
उम्मीद दर्द
प्यार हर सफर है यहां,
खेत,
हरियाली ,गांय,
और प्रकृति
की असल आनंद है यहां
भाई,
काका,
ताई हर रिश्ते
का असर है यहां.
पड़ोसी,
आँगन,
चिडि़या की
चहचहाट है यहां.
खुली
हवा, साफ
पानी, दादी
की कहानी, है
यहां.
ख़ुशी
के बाराती, दुःख
के साथी हैं यहां.
बारिश
का पानी, वसंत
की हरियाली है यहां.
सर्दी
में गुड़ वाली चाय और गर्मी
में मीठा ठंडा पानी है यहां.
छप्पर
वाली दुकान, छोटे
मकान, बड़ी
सोच वाला इंसान हैं
यहाँ.
मिट्टी
से सने कपड़े में, दिल
के साफ आदमी है यहां.
संस्कार,
सभ्यता,
असली हिन्दुस्तानी
सस्कृति है यहां.
शनिवार, 2 मई 2015
विस्थापन का दर्द और विकास का मरहम
जाते हुए लोग शायद ही किसी को अच्छे लगते हो। लेकिन आज उत्तराखण्ड में हर रोज कोई न कोई अपना घर छोड़ने को मजबूर है। यहां के लोग पेट के भूगोल के कारण अपने पुस्तैनी जमीन छोड़ने को विबश है। मूलभूत संसाधानों की कमी और बेरोजगारी के कारण पहाड़ के गावों में आज बस, तालें लगे मकान और मुरझाएं से कुछ चेहरे ही शेष बचे है। पहाड़ी गांव विस्थापन के दर्द से कराह रहे हैं।
पहाड़ की वादियों में रहने वाले लोग मेहनती होते है, पर अफसोस अब उनकी उम्मीद टूटती जा रही है। आज पहाड़ से, उसका पानी और जवानी दोनों रूठ गई है क्योंकि विकास बनाम विस्थापन की दौड़ में विस्थापन जीतता नजर आ रहा है। आकड़ों के अनुसार विस्थापित होने वालों लोगों में ज्यादातर संख्या युवाओं की है जो पहले शिक्षा के लिए फिर रोजगार के लिए गावों को छोड़ने को मजबूर हो रहे है। उत्तराखण्ड में 69.77 प्रतिशत जनसंख्या पहाड़ी गावों में रहती है लेकिन कुछ वर्षों से शहरों में विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
उत्तराखण्ड राज्य में विस्थापन की घटना बहुत पुरानी है लेकिन वैश्वीकरण के पश्चात् विस्थापन ने महामारी का रूप ले लिया। पहाड़ी गावों में मूलभूत सुविधा के अभाव, रोजगार के अल्पसाधनों का होना इसकी मुख्य वजह है। पहले जहां घर का एक सदस्य बाहर जाकर काम करता था वही आज अपने बच्चों की शिक्षा दीक्षा एवं उज्जवल भविष्य की चिंता के कारण पूरा परिवार ही अपनी विरासत और संस्कृति से दूर दिल्ली, पंजाब जाने को मजबूर हो रहा है। इसके अतिरिक्त एक और प्रकार का विस्थापन होता है जिसमें लोग अपने गावों को छोड़कर आसपास के शहरों में जाकर बस जाते है, जिससे उस शहर में जनसंख्या दबाव की समस्या उत्पन्न होने लगती है। कुल मिलाकर देखंे तो यह भयावह दर्द हर रोज नई समस्या को जन्म दे रहा है । एक ओर गांव खाली हो रहे है वही आसपास के शहरों में संसाधनों पर जनसंख्या का भार बड़ता जा रहा है। इस सबके साथ आने वाली पीढी़ अपनी संस्कृति, मूल्यों एवं परंपराओं से दूर होती जा रही है।
किसी भी देश का पहाड़ी भूभाग उसके पर्यावरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। और विशेष तौर पर उत्तराखण्ड जैसा राज्य, जहां से दो प्रमुख नदियों, गंगा एवं यमुना, का उद्गम स्थल है, की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। लेकिन पलायन की महामारी ने सुन्दर गावों को भूताहा गावों में बदल दिया है।
गावों से भागतें लोगों की दःुखी आखों में निराशा होती है, दर्द होता है और साथ अनेक सवाल होते, उस क्षेत्र के विकास को लेकर। विकास तो होता है पर वह कभी राजनीति तो कभी अन्य कारणों की वजह से धरातल पर नहीं उतर पाता है। इसके लिए कुछ बातों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। पहला, विकास की प्रकिया में गांव के लोगों की पूरी भागीदारी हो, योजना बनाने से लेकर क्रियान्वयन तक उनका सहयोग लिया जाए। दूसरा, पंचायती राजव्यवस्था जो जितनी ताकत संविधान में दी गई है उसे हकीकत में परिणीत किया जाए, संस्था को गावों के विकास के लिए संपूर्ण अधिकार दिए जाए और तीसरा, लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ यानी मीडिया को पहाड़ के सवालों से विशेष इत्तेफाक रखने की जरूरत है, ताकि चारों ओर फैली निराशा को सकारात्मकता के वातावरण से मिटाया जा सके। वास्तव में इन्ही प्रयासों के माध्यम से पहाड़ी गावों में संव्याप्त विस्थापन के दर्द पर सुनियोजित विकास का मरहम लगाया जा सकता है।
पहाड़ की वादियों में रहने वाले लोग मेहनती होते है, पर अफसोस अब उनकी उम्मीद टूटती जा रही है। आज पहाड़ से, उसका पानी और जवानी दोनों रूठ गई है क्योंकि विकास बनाम विस्थापन की दौड़ में विस्थापन जीतता नजर आ रहा है। आकड़ों के अनुसार विस्थापित होने वालों लोगों में ज्यादातर संख्या युवाओं की है जो पहले शिक्षा के लिए फिर रोजगार के लिए गावों को छोड़ने को मजबूर हो रहे है। उत्तराखण्ड में 69.77 प्रतिशत जनसंख्या पहाड़ी गावों में रहती है लेकिन कुछ वर्षों से शहरों में विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
उत्तराखण्ड राज्य में विस्थापन की घटना बहुत पुरानी है लेकिन वैश्वीकरण के पश्चात् विस्थापन ने महामारी का रूप ले लिया। पहाड़ी गावों में मूलभूत सुविधा के अभाव, रोजगार के अल्पसाधनों का होना इसकी मुख्य वजह है। पहले जहां घर का एक सदस्य बाहर जाकर काम करता था वही आज अपने बच्चों की शिक्षा दीक्षा एवं उज्जवल भविष्य की चिंता के कारण पूरा परिवार ही अपनी विरासत और संस्कृति से दूर दिल्ली, पंजाब जाने को मजबूर हो रहा है। इसके अतिरिक्त एक और प्रकार का विस्थापन होता है जिसमें लोग अपने गावों को छोड़कर आसपास के शहरों में जाकर बस जाते है, जिससे उस शहर में जनसंख्या दबाव की समस्या उत्पन्न होने लगती है। कुल मिलाकर देखंे तो यह भयावह दर्द हर रोज नई समस्या को जन्म दे रहा है । एक ओर गांव खाली हो रहे है वही आसपास के शहरों में संसाधनों पर जनसंख्या का भार बड़ता जा रहा है। इस सबके साथ आने वाली पीढी़ अपनी संस्कृति, मूल्यों एवं परंपराओं से दूर होती जा रही है।
किसी भी देश का पहाड़ी भूभाग उसके पर्यावरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। और विशेष तौर पर उत्तराखण्ड जैसा राज्य, जहां से दो प्रमुख नदियों, गंगा एवं यमुना, का उद्गम स्थल है, की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। लेकिन पलायन की महामारी ने सुन्दर गावों को भूताहा गावों में बदल दिया है।
गावों से भागतें लोगों की दःुखी आखों में निराशा होती है, दर्द होता है और साथ अनेक सवाल होते, उस क्षेत्र के विकास को लेकर। विकास तो होता है पर वह कभी राजनीति तो कभी अन्य कारणों की वजह से धरातल पर नहीं उतर पाता है। इसके लिए कुछ बातों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। पहला, विकास की प्रकिया में गांव के लोगों की पूरी भागीदारी हो, योजना बनाने से लेकर क्रियान्वयन तक उनका सहयोग लिया जाए। दूसरा, पंचायती राजव्यवस्था जो जितनी ताकत संविधान में दी गई है उसे हकीकत में परिणीत किया जाए, संस्था को गावों के विकास के लिए संपूर्ण अधिकार दिए जाए और तीसरा, लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ यानी मीडिया को पहाड़ के सवालों से विशेष इत्तेफाक रखने की जरूरत है, ताकि चारों ओर फैली निराशा को सकारात्मकता के वातावरण से मिटाया जा सके। वास्तव में इन्ही प्रयासों के माध्यम से पहाड़ी गावों में संव्याप्त विस्थापन के दर्द पर सुनियोजित विकास का मरहम लगाया जा सकता है।
बुधवार, 7 जनवरी 2015
गांव क्या है....
गांव कहते ही मन में एक खुशनुमा एहसास जाग उठता है। खेत, खलियान, पालतु जानवर, किसान आदि अनेक चित्र कल्पना में आ जाते है। लेकिन क्या यह एहसास आज के युवामन में भी आते होंगे, यह चिंतन का विषय है ? गांव की कल्पना वही व्यक्ति कर सकता है जो कभी ऐसे माहौल में रहा हो, जिसका परिवार, नाते रिश्तेदारों ने इस परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश की हो। पर आज कितने लेाग ऐसे है जो गांव जाना चाहते है, जाना तो चाहते है पर केवल घुमने के लिए। पर वहां बसने के लिए कोई नहीं जाना चाहता।
आज की पड़ताल है गांव क्या है? इसकी खोज करना क्योंिक आज गांव हमारे मनों से कही खो से गए है। गांव, एक शब्द में कहूं तो सहयोग का दूसरा नाम है। यकीन नहीं होता तो गांवों की पद्धतियों को स्मरण करके देखो। यहां सहयोग से तात्पर्य उस पवित्र परंपरा से है जिसके अतंर्गत गांव हर समय एक नेटवर्क की तरह जुड़ा रहता है। इतने बड़े समूह के तौर पर कुशल संचार प्रक्रिया का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता है। वृक्ष की जड़ की तरह गांव किसी भी समाज का मूल होता है। बिना पैर के शरीर जिस प्रकार असहाय हो जाता है, उसी प्रकार गांव से जुड़े बिना मनुष्य संस्कृति, संस्कारों से दूर हो जाती है।
गांव एक परंपरा का नाम है। यह संस्कारों की पाठशाला है। देश का प्रत्येक नागरिक गांव से अपनी शुरूआत करता है या कहे वह किसी न किसी रूप से गांव से जुड़ा होता है। गांव हर व्यक्ति के अंदर बीज बोने का काम करता है ताकि भविष्य में उसका फल समाज के काम आ सके। गंाव एक आनंद है जिसमें संतोष का सुख है। गांव अर्थव्यवस्था से राजव्यवस्था की धूरी है। लेकिन आखिर में इन सब विशेषताओं के सोचने के बाद हमें गांव की परिभाषाओं के बारे में क्यों सोचना पड़ रहा है। शायद इसलिए क्योंकि गांव आज हमसे दूर चले गए है या कहे गावों से हम दूर चले गए है। पर कितने दिनों तक हम अपनी जड़ों से दूर रह सकते है। कभी न कभी तो हमें उस ओर लोटना ही होगा।
आज की पड़ताल है गांव क्या है? इसकी खोज करना क्योंिक आज गांव हमारे मनों से कही खो से गए है। गांव, एक शब्द में कहूं तो सहयोग का दूसरा नाम है। यकीन नहीं होता तो गांवों की पद्धतियों को स्मरण करके देखो। यहां सहयोग से तात्पर्य उस पवित्र परंपरा से है जिसके अतंर्गत गांव हर समय एक नेटवर्क की तरह जुड़ा रहता है। इतने बड़े समूह के तौर पर कुशल संचार प्रक्रिया का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता है। वृक्ष की जड़ की तरह गांव किसी भी समाज का मूल होता है। बिना पैर के शरीर जिस प्रकार असहाय हो जाता है, उसी प्रकार गांव से जुड़े बिना मनुष्य संस्कृति, संस्कारों से दूर हो जाती है।
गांव एक परंपरा का नाम है। यह संस्कारों की पाठशाला है। देश का प्रत्येक नागरिक गांव से अपनी शुरूआत करता है या कहे वह किसी न किसी रूप से गांव से जुड़ा होता है। गांव हर व्यक्ति के अंदर बीज बोने का काम करता है ताकि भविष्य में उसका फल समाज के काम आ सके। गंाव एक आनंद है जिसमें संतोष का सुख है। गांव अर्थव्यवस्था से राजव्यवस्था की धूरी है। लेकिन आखिर में इन सब विशेषताओं के सोचने के बाद हमें गांव की परिभाषाओं के बारे में क्यों सोचना पड़ रहा है। शायद इसलिए क्योंकि गांव आज हमसे दूर चले गए है या कहे गावों से हम दूर चले गए है। पर कितने दिनों तक हम अपनी जड़ों से दूर रह सकते है। कभी न कभी तो हमें उस ओर लोटना ही होगा।
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